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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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बुधवार, 9 जनवरी 2013

ऋतू की कसमकस...!!



हमारे पुरानी डायरी पलटी तो देखा कुछ शब्द लिपटे थे ... बंधे एक दूजे से .. याद नहीं कब किस समय लिखा था पर ... फिर भी पढ़ लीजिये .. शायद अच्छा लगे..!!

ऋतू की बाते कुछ हमें भी जमने लगी ..
हम हटे वहा से की बर्फ पिघलने लगी ..!!

छलक जाते है अब इन मैकासों से पैमाने ..
कभी तो धुप थी अब बदरी होने लगी ..!!

कयास लगा रहे थे कि बारिश भी होने लगी ..
लो भीग गए हम अब क्या हवा बहने लगी ..!!

सूखे पत्ते जैसे सिकोड़ कर रख लिया..
कि फिर धूप सर तलक आने लगी..!!

इस कसमकस से उबरने लिए देख ..
अलाव जलाया था कि तूफ़ान बुझाने लगी ..!!

कुछ हद तक छुपाया अपनी हथेलियों से ..
कि अब्र अपनी अन्सको से भिगोने लगी ..!!

क्या हैं क्या ये ऋतू की फेर ए राहुल ..
कभी गर्मी थी वह पर अब सर्दी जकड़ने लगी ..!!

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