भोर के तारे,सांझ का आलस,रात का सूरज,पतझड़ के भौरे.... ताकते हैं हमेशा एक अजीब बातें जो लोग कहते हो नहीं सकता... चलते राहों पर मंजिल पाने को पैदल चल रहे कदमो में लिपटे धूल की परत... एक अनजाने की तरह उसे धुलने चल दिए...कितनी कशिश थी उस धूल की हमसे लिपटने की...कैसे समझाए वो...मौसम भी बदनुमा था शायद या थोड़ा बेवफा जैसा...एक जाल में था फंसा हर आदमी जाने क्यूँ पता नहीं क्यूँ समझ नहीं पाता इतना सा हकीकत...एक तिनका हैं वो और कुछ भी नहीं...कुछ करना न करना में उसे हवाओं का साथ जरूरी हैं..
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शनिवार, 11 मई 2013
बुधवार, 3 अप्रैल 2013
पीटी लाइन...
एक
कड़कती धूप मे
कतार लगाए कितने खंभे...!!
सभी
के बंधे हैं सिरहाने
दोनों हाथ ऊपर ताने खड़े...!!
ओह
पीटी लाइन लगी
शनिवार ही रहता यहाँ रोज...!!
~खामोशियाँ©
शनिवार, 2 मार्च 2013
ख्वाइश...
धूप के साये मे निशान कहाँ आते...
टूटी शाख पे अब इंसान कहाँ आते...॥
ख्वाब अधूरे ना छूटते बशर के...
ख्वाब अधूरे ना छूटते बशर के...
रातों को जगाने अब हैवान कहाँ आते...॥
जुबान छिल जाती गज़लों की महफ़िलों मे...
जुबान छिल जाती गज़लों की महफ़िलों मे...
जुम्मे की दुपहरी पे अब अजान कहाँ आते...॥
दुवाओ के थूकदान सजाते दरवाजे पर...
दुवाओ के थूकदान सजाते दरवाजे पर...
इस सुनसान मे अब मेहमान कहाँ आते...॥
ख्वाइशों की कतार लगाए खड़े हम...
मीरा के शहर मे अब घनश्याम कहाँ आते...॥
सोमवार, 1 अक्टूबर 2012
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