भोर के तारे,सांझ का आलस,रात का सूरज,पतझड़ के भौरे.... ताकते हैं हमेशा एक अजीब बातें जो लोग कहते हो नहीं सकता... चलते राहों पर मंजिल पाने को पैदल चल रहे कदमो में लिपटे धूल की परत... एक अनजाने की तरह उसे धुलने चल दिए...कितनी कशिश थी उस धूल की हमसे लिपटने की...कैसे समझाए वो...मौसम भी बदनुमा था शायद या थोड़ा बेवफा जैसा...एक जाल में था फंसा हर आदमी जाने क्यूँ पता नहीं क्यूँ समझ नहीं पाता इतना सा हकीकत...एक तिनका हैं वो और कुछ भी नहीं...कुछ करना न करना में उसे हवाओं का साथ जरूरी हैं..
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शुक्रवार, 17 मई 2013
गुरुवार, 16 मई 2013
गुरुवार, 28 मार्च 2013
बुधवार, 27 मार्च 2013
गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013
मौसम
निकल गए रास्तों मे तो बहक हम जाएंगे...
बदली हैं अभी शाम तक सितारे छा जाएंगे...!!!
कब से मुह बाए खड़ी सींप दरींचो पर..
बचाओ उन्हे या कौड़ियाल शुक्र मनाएंगे...!!!
बड़ी तेजी से खींचती धूप नयी कोपले...
पकड़ ले वरना लोग दिन मे ही खो जाएंगे...!!!
महफ़िलों मे जरा आंखो पे सजा लेना...
बर्जे पर दो-चार आँसू छोड़ जाएंगे...!!!
बड़ी उदास मन से हर रोज पूछते मेंढक...
आखिर बरसातों के मौसम कब तक आएंगे...!!
बुधवार, 9 जनवरी 2013
ऋतू की कसमकस...!!
हमारे पुरानी डायरी पलटी तो देखा कुछ शब्द लिपटे थे ... बंधे एक दूजे से .. याद नहीं कब किस समय लिखा था पर ... फिर भी पढ़ लीजिये .. शायद अच्छा लगे..!!
ऋतू की बाते कुछ हमें भी जमने लगी ..
हम हटे वहा से की बर्फ पिघलने लगी ..!!
छलक जाते है अब इन मैकासों से पैमाने ..
कभी तो धुप थी अब बदरी होने लगी ..!!
कयास लगा रहे थे कि बारिश भी होने लगी ..
लो भीग गए हम अब क्या हवा बहने लगी ..!!
सूखे पत्ते जैसे सिकोड़ कर रख लिया..
कि फिर धूप सर तलक आने लगी..!!
इस कसमकस से उबरने लिए देख ..
अलाव जलाया था कि तूफ़ान बुझाने लगी ..!!
कुछ हद तक छुपाया अपनी हथेलियों से ..
कि अब्र अपनी अन्सको से भिगोने लगी ..!!
क्या हैं क्या ये ऋतू की फेर ए राहुल ..
कभी गर्मी थी वह पर अब सर्दी जकड़ने लगी ..!!
रविवार, 6 जनवरी 2013
पुरानी बस्ती...!!!
मुसाफिर बने घुस गया पुरानी बस्ती में ..
अंश्कों को सैन्हारते पंहुचा मस्ती में ..!!
सुखाने बैठा जब भीगे रुमाल देख ..
यादें ही बैठी अलाव जलाए कस्ती में ..!!
फूँक मारा और जल उठे वादों के पुवरे ..
पर जल गया मैं फिर उन्ही परस्ती में ..!!
गलती थी कुछ तभी झेला हूँ अब तक ..
वरना कौन सजाता पैमाना इतनी सस्ती में ..!!
धो नहीं पा रहा था लिए ताउम्र उन्हें ..
तभी बंच आया ख्वाब उन्ही पुरानी बस्ती में ..!!
शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012
दराज के आंशु ...!!!
एक अर्शे से रखी थी दराज के कोने में .... वो आयातों की किताब .. !!
आखिर क्या जफा हुई पकड़ न सका ...वो आयातों का सैलाब .. !!
इन मुक्कादारों ने भी जाने कितने खीरोचे दी ए दोस्त ,
ज़ेहन में लगे महीन धागों को लहू बना गया वो ख्वाब .. !!
देख कैसे पालथीमार के बैठे हैं हर्शू ग़मों के अब्र ,
कितनी बरसातों बाद निकल पाएँगे मेरे चेहरे के टूटे नकाब .. !!
गुरुवार, 30 अगस्त 2012
कुछ अनछुए पहलु...!!!
एक याद तस्वीरों से लिपटी हैं...कोई पढ़ सके थो पढ़ ले...वरना मौला भी दुखों के पैमाने...सबके अलग ही अलग बनाता..दूसरा कोई किसी और के जाम नहीं निगल सकता ..."
हमने भी रख ली हैं अपनी पलकों
पर तेरी भीगे हुई ग़मगीन आँखें...!!!
जैसे गिरजे में छाई खामोसी,
और रहलो पर बैठी महीन बाहें... !!!
एक आंसू गिरा दो दृगों से दर्जे पर,
कौन पहचाने किसकी नमकीन आहें...!!!
कैसे पुकारेगा पत्थर से लिपटा वो,
जिनकी यादों से भी संगीन थी बातें....!!!"
मंगलवार, 28 अगस्त 2012
सोमवार, 27 अगस्त 2012
झील में नहाता चाँद
दिल भीगा नहीं कि अंगारे बरस गए...
ख्वाब जला नहीं कि खालिश झुलस गए...!!!
बड़ी दर्द थी बादल की ककाराहट में देख...
आंसू भी उसके दामन से सरक गए ...!!!
सूखा गया सब कैसे भी लोग संभल गए,
लूह चली इन वादियों के बौर झुलस गए...!!!
कुछ की छतरी निकली गयी इन आलमों में,
शायाद वे ही बच के कहीं बस गए...!!!
ना रहा उसकी गोद में थोडा भी पानी,
तभी यहाँ लोग कतरा कतरा को तरश गए...!!!
कब से खोज रही धरा तुझे ए चाँद..
पर तुम पहले ही किसी झील तलक उतर गए...!!!
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