बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"
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शनिवार, 7 अप्रैल 2018

लप्रेक 12



धूधली सी शाम में श्याम के कंधों पर सर रखकर बैठी थी। काफी देर तक की खामोशी को चीरते हुए, नीतू नें आसमान में आकृति दिखाते हुए कहा चलो न उस बादल के पीछे चले।

एक बादल से दूसरे पर आइस-पाइस खेलेंगे। तुम सूरज ओढ़ लेना मैं चाँद पॉकेट में छुपा लूँगी। फिर अदला बदली करेंगे दोनों का। ले जाऊँगी बहुत दूर मेरी नानी के गाँव में ये चाँद गड्ढे में छुपा दूँगी। फिर चाँद दिन पूरी करने ना आएगा।

और मैं तुम्हारे साथ यहीं पूरे एक दिन एक सौ बरस जैसे गुज़ार दूँगी।

© खामोशियाँ - 2016 | मिश्रा राहुल
(06 - अप्रैल - 2016) (डायरी के पन्नो से)

रविवार, 11 जून 2017

Laprek (Amitesh and Anjana) Ft. Misra Raahul | Episode One


A Laprek is 'LaPreK' -- an acronym for Laghu Prem Katha (Short Love Story).
The idea of brief, abstract stories invoking nostalgia and love and with a contemporary. An Experiment done by young individual to Record the Very Short Musical Story as well narrate it in such a manner that one can feel it deeper corner.
Story: खामोशियाँ
Narration: Misra Raahul
Music by: Aarsy Productions
Visit at www.aarsyproductions.com
Cover Designing: Codesgesture Technology
Visit at www.codesgesture.com

रविवार, 13 नवंबर 2016

लप्रेक १९

अंजू नें बालों की क्लिप उतार कर उन्हें हवाओं में तैरने के लिए छोड़ दिया। इधर सुनील की पल्सर हवाओं से बातें कर रही थी वही बातें अंजू की जुल्फें सुलझाते कानों में समां रही थी।

तभी अंजू नें सवाल किया सबसे कीमती चीज क्या है तुम्हारी सुनील बोल पड़ा बातें। इधर अंजू नें ठहाके मार कर कहा, हाँ वो न बंद हो सकती और न पुरानी।

इतने देर में दोनों अपने पसंदीदा रेस्टोरेंट की मनपसंद सीट पर जा बैठे। आर्डर हो गया और शुरू हुआ बातों का सिलसिला वो भी क्यों न हो आखिर पूरे चार साल बाद जो दोनों मिले थे।

दरअसल अंजू बड़ी अड़ियल लड़की थी कॉलेज की और सुनील बड़ा सीधा सा लड़का। दोनों की केमिस्ट्री न कॉलेज को समझ आई, ना उन्ही दोनों को।

अंजू के अंदर लड़कों के गुण थे। देर रात तक डांस बार, घूमना फिरना, बिंदास रहना। वहीँ सुनील बड़ा शांत, गंभीर और मझा हुआ बंदा। कोई मेल नहीं था दोनों में लेकिन साथ थे दोनों। प्यार है ना हो जाता पूछता नहीं।

बातों बातों में दोनों की शाम हो ही जाती। आज भी वही बातें जिनको अगर टेप-रिकॉर्डर चलाके भी सुनो तो हू-ब-हू एक मिलेंगी।

कॉफ़ी हर बार जैसी ठंडी हो गयी। टोस्ट कड़े हो गए। टेबल पर बिल आ गया और सुनील बस एक टक अंजू की आँखों में झांकता रह गया।

"सुनील वेटर बिल लेके आया है कहाँ खोये हो।" अंजू नें पूछा

"ओह हाँ बिल अंजू तुझमे इतना घुल जाता ना और कोई सूझता नहीं मुझे।" सुनील नें कहा

सुनील नें जेब में हाथ डाला। और मिला 500 रुपए का नोट। जिसे देखकर वेटर नें नाक-भंव सिकोड़ लिए। किसी तरह समझ-बुझाकर अंजू नें वेटर को हटाया।

"सुनील आज तो मैंने भी जल्दबाजी में अपना पर्स भूल आई। देखो कुछ और है क्या तुम्हारे पर्स में।" अंजू नें मुस्कुराते कहा

"हाँ है पर मैं वो दे नहीं सकता।" सुनील नें अपना फैसला सुना दिया

"पर ऐसा क्या है, जो नहीं दे सकता" अंजू नें उत्सुकता से पूछा

"यार ये वो चार सौ रुपए है जो तुमने मुझे अपना बिज़नस शुरू करने को दिया था। कितनी दिक्कतें आई मैंने इसे खर्च नहीं किया। और मैं इसे इस्तेमाल नहीं कर सकता बस" सुनील नें सफाई दी

"लेकिन पेमेंट कैसे" अंजू इतना बोल पाई की उसने रोते हुए सुनील को गले से लगा लिया।

इधर मंजर रूमानी होता जा रहा था। तभी बैकग्राउंड से आवाज आई। टेबल नंबर 9 का पेमेंट हो गया है।

दोनों चौंककर मेनेजर को देखने लगे।
हाँ भाई आज आपकी 25वीं डेट है, तो मेरी रेस्टोरेंट नें आपकी ट्रीट को फ्रीबी कर दिया।

दोनों की आँखें मेनेजर को थैंक्यू कर रही थी। और मेनेजर साहब नें आँखों में ही थैंक्यू कबूल भी कर लिया।

- मिश्रा राहुल (डायरी के पन्नो से)
(ब्लॉगिस्ट एवं लेखक) (13-नवम्बर-2016)

लप्रेक १८

काफी देर से बेंच पर बैठे कबीर की आँखों को किसी ने अचानक से आकर अपनी नर्म हथेलियों से ढंक लिया।

गिन्नी फिर तू मुझे पहचानने को कहेगी और मेरा जवाब भी यही रहेगा, "सोते , जागते, उठते, बैठते गिन्नी गिन्नी रहती इर्द-गिर्द।
गिन्नी के हाथ को हटाते हुए कबीर हिचकते हुए बोल पड़ा।


गिन्नी भी मुस्कुरा कर अपनी तारीफों को कबूल किया।

"देख इतनी देर में मुझे हिचकियाँ भी आने लगी", कबीर ने बोला।

हिचकी वाली बात और गिन्नी नें फटाक से जवाब दिया,
"कबीर सांस रोको"
फिर अपनी उँगलियों को दूसरी उँगलियों के सहारे गिनना शुरू किया।
एक, दो, तीन, चार और अब पूरे पांच। हाँ सांस ले सकते हो।

वाह गिन्नी सच-मुच हिचकी छुमंतर। ये तरीका कहाँ से आया, कबीर ने उत्सुकता से पूछा।

गिन्नी नें जवाब में कहा, "तुम्हारी हिचकियों को भी अब पता चल गया मैं आ गयी हूँ और क्या। इतना भी समझ नहीं आता तुम्हे।"

फिर बातें बढ़ते चली गयी कभी ना रुकने वाली बातें।

- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

लप्रेक १७

श्रुति नें जैसे ही बैग में अपनी साइंस की नोटबुक निकलने को हाथ डाला। उसके हाथों में सफ़ेद बैकग्राउंड पर उभरा गुलाब से लिपटा एक शानदार कार्ड आया। ऊपर की जिल्द ही इतनी खूबसूरत थी की मानो काफी कुछ खुद ही बयाँ कर रही हो।

श्रुति नें कार्ड खोल दिया। उलटे हाथों से लिखे गए उस कार्ड में हैंडराइटिंग जानबूझकर बिगाड़ी गयी थी।


श्रुति से रहा न गया, उसकी निगाहें क्लासरूम के आठों कोनो को एक दफे निहार गयी। पूरी क्लास कहीं ना कहीं व्यस्त थी, वहीँ आठों कोनो में से दो आँखें चार हो गयी।

साथ ही एक मुस्कान नें कार्ड पर अपनी दस्तखत कर, प्यार की बयार पर मुहर लगा दी।

- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवम् लेखक)

लप्रेक 1६

तेज़ वाईफ़ाई और कड़वी कॉफी के बीच अमितेश मानो खो गया। वो जिस टेबल पर बैठा था। उसके ठीक सामने दीवाल पर टंगी पेंटिंग अजीब सा अपनापन झलका, उसे खीचने का प्रयास कर रही थी। पर उसकी कूँची और कैनवास उसकी उंगलियां छोड़ने की इज़ाज़त देने को तैयार ना थी।

पेंटिंग भी अजीब सी उलझी उलझी।मानो किसी डिम लाइट की फोटोग्राफी थी बस जो दो लोगों की छाया नज़र आ रही। उसमें दो प्यालों के बीच में कुछ पुराने फ़टे हुए कूपन, एक साइड से कैंची से कतरे हुए। कुछ सेलफोन टेबल सी चिपका कर रखे हुए।

तेज़ वाईफ़ाई में उसका इंस्टाग्राम बड़े तत्परता से कुछ साइड के कलाकारों को आउटफोकस कर रहा था।
अमितेश शायद कुछ खोज रहा था। इसी तल्लीनता में उसने चार प्याले खाली कर दिए। तभी उसकी सफ़ेद स्क्रीन अचानक रंगबिरंगी हो गयी।

एक रिंग बजी और फ़ोन उठ गया।
एक सांस में सारी कॉफी बातों से खाली कर दी।

पीछे से मेनेजर साहब की आवाज़ आई मुझे बुला रहे थे मेरे बिना पूछे बोल पड़े। वो पागल है साहब। रोज़ आता है कुछ प्याले गतकता फिर कुछ उलटे सीधे पेंटिंग बनाता कुछ फ्रेम कर मुझे दे जाता। मैं भी उसकी बात टाल नहीं पाता। मुझे सच्चे प्यार-मोहब्बत में कोई दिलचस्पी नहीं, पर अमितेश को देखता हूँ तो उसकी पेंटिंग से अंजना मैडम का चेहरा खुद बना लेता हूँ।

क्या यह प्यार नहीं? मेनेजर साहब के प्रश्न नें मुझे तीन सौ साथ डिग्री घुमा दिया और दीवाल पर लगी पेंटिंग ने मुझे अमितेश-अंजना की यादों से।

- मिश्रा राहुल (ब्लोगिस्ट एवं लेखक)
(२१-अगस्त-२०१६) (डायरी के पन्नों से)

लप्रेक १५


इंजन की सीटी नें अचानक विनय को जगा दिया। सामने बोर्ड पर बड़े लाल अक्षरों में लिखा था " विश्व के सबसे लंबे प्लेटफॉर्म पर आपका स्वागत है"। विनय की ख़ुशी का ठिकाना ना था कलाई घुमा के देखा सुबह के नौ बजे थे। वो खुश इसलिए नहीं था कि वह अपने गोरखपुर को विश्व के नक़्शे पर गौरवान्वित देख रहा था। बल्कि उसकी भीनी मुस्कान के पीछे उस बोर्ड का नहीं बल्कि उसके पहले गड़े उस लोहे के बेंच का खास योगदान था। जैसे ही विनय उस बेंच पर बैठ मानो पूरा स्टेशन आठ बरस पीछे चला गया हो।

विनय, उसका पसंदीदा स्काई बैग्स और साथ में गुलाबी सिक्के की इयरिंग्स कानो में फंसाए, सफ़ेद बैकग्राउंड पर ग्राफिटी वाली टीशर्ट पर नीली शार्ट जीन्स पहनी, चपड़ चपड़ बोलने वाली संजना।

तस्वीरें इतनी क्लियर थी की मानो आवाज़ बहार आ रही हो। पर कुछ ऐसा खटका की सब गयाब हो गया। पीछे के मनोज वेंडर से छोटा सा बच्चा आकर बोला विनय सर। आपका एक गिफ्ट पिछले आठ साल से मेरे दूकान पर पड़ा है। उस दिन मैडम भूल से छोड़ गयी थी।

संजना का नाम सुनते ही विनय को अजीब सी बेचैनी हो उठी। मानो वो वो किसी सोने में था पर उठना ना चाह रहा हो।

विनय नें जल्द ही रेपर खोल अंदर थी "द नोटबुक"। विनय को समझ नहीं आया इस नावेल में ऐसा क्या जो संजना बोलना चाह रही हो। बल्कि संजना को अच्छे से पता विनय जेएनयू में अंग्रेजी से पीएचडी करने गया था। साथ ही उसका शौक था अंग्रेजी में। इन साब सवालों का जवाब खोजते बुनते उसनें किताब को तेज़ी से पढना शुरू किया।

उत्सुकता में 224 पन्ने की नावेल को एक घंटे में गटक गया। पर कुछ जवाब मिलता ना देख उसनें किताब को बगल लगा दिया। किताब के रेपर पर कुछ पेंसिल से लिखा था।

"जिसकी ज़िन्दगी में अरमान बड़े होते वो अक्सर मंजिलों तलाश कर लेता है।"

संजना दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर यूनिवर्सिटी से हिंदी में पीएचडी कर रही थी। अब प्यार में हिंदी-इंग्लिस का कॉम्बो अजीब था।
जितना संजना को अंग्रेजी से चिढ़ थी उतनी ही विनय को हिंदी से। फिर भी विनय नें लिखी गुत्थी को हल करने की सोची।

विनय बाहर निकला तो शहर को देखकर चौक गया शहर काफी कुछ बदल चूका था। इन आठ सालों मैं गोरखपुर के तस्वीर बदल गयी थी।
गुत्थी के अनुसार संजना को ढूढ़ना शुरू किया। अरमान, मन्जिल और
ज़िन्दगी से उसनें अंदाज़ा लगाया मोहतरमा नें फ्लैट ले लिया है। फिर क्या था विनय चल पड़ा तारामंडल की ओर। अब बारी थी अरमान ढूढ़ने की उसनें तारामंडल में अरमान नाम के फ्लैट खंगलनें शुरू किये। वो भी जल्द ही मिल गया अरमान रेजीडेंसी। और सामने खड़ी मिली संजना।
संजना को देखकर विनय उससे लिपट गया।

और बोला तुमको पता था मैं आने वाला हूँ। और ये गिफ्ट आज ही रखवाया ना। सब जानता हूँ मैं।

संजना नें मुस्कुराया, " हाँ। और मैं ये जानती थी, कि तुम मेरी पहेली झट से हल कर दोगे।

फिर सारी बातें होती रही। और कब इंजन की तेज़ हॉर्न नें विनय को मीठे सपने से उठा दिया पता ही न चला। उसकी कलाई में शाम के साढ़े छह बज रहे थे। फिर ट्रेन मिस हो गयी।

कुछ लोगो से जानकारी की तो पता चला पिछले आठ सालों से विनय रोज़ सुबह खड़े किसी भी इंजन में आकर सोता है फिर उठकर बाहर बेंच पर बैठता है। फिर कोई किताब उठता और शाम हो जाता।

कोई इतना भी पागल होता किसी के प्यार में।

- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवम् लेखक)
(०६-अगस्त-२०१६)

लप्रेक 14

साक्षी के गोरे से हाथों को अपनी बड़ी हथेली में बिछाकर, संजय लकीरों से लुका छिपी खेल रहा था।
कुछ देर चुप रहा। फिर अचानक से बोल पड़ा। अपनी तेरी जोड़ी सुपरहिट है। हथेलियों के मकड़जाल में से एक धागे को छूकर उसने साबित भी किया।


साक्षी चुपचाप हंसनें लगी और बात बड़े शायराना लहजे में समेट दिया।
"हर रोज़ खोजते हो मेरी हाथो की लकीरों में,
ऐसे छेड़ने के अंदाज़ में भला कौन न फ़िदा हो।"

फिर नज़रों की गुफतगू नें पूरा मंज़र रूमानी कर दिया।

- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवम् लेखक)

मंगलवार, 31 मई 2016

लप्रेक १३



जानती हो श्रेया हेडफोन का बायाँ शिरा तुम्हारी कानों में क्यों लगाता ? गानों की इमोशनल बातें बाए कानो तक जल्दी पहुँचती।

"अच्छा जनाब, फिर दाहिने कानो का कॉन्सेप्ट समझाइये" श्रेया नें पूछा

मेरा हेडफोन का दाहिना शिरा खराब है। गानों की लब्ज़ों को तुम्हारे होंठों से टटोलकर, तुममें खो जाता हूँ।

फिर तीन शब्दों को चार शब्दों में बनाकर बातें ख़त्म हो गयी और गानों की धुन में माहौल सराबोर हो गया।

लप्रेक १२

एनफील्ड की पिछली सीट पर बैठी दिव्या पिछले दस मिनट से बोले जा रही थी। कुछ रेस्पॉन्स ना आता देख उसनें खीजते हुए कहा, "या तो अपनी ये फटफटी बेंच दो या मेरे साथ पैदल चला करो। दोहराने में फिर से वही इमोशन नहीं ला पाती मैं।"

रिशब नें मुस्कुराते कहा, "याद है इसी एनफील्ड पर तुम्हे सबसे पहले बेतियाहाता की चमचमाती सड़कों पर घुमाया था। फिर भी लाख बात की एक बात होती तुम्हारी।

अगले दिन रिशब नें पहली बार दिव्या के घर पहुचकर कॉल किया।
रिशब नें कहा, "हेल्लो दिव्या बहार आओ मैं आ गया"।
दिव्या बाहर आते ही, दंग रह गयी।
सामने खड़ी थी सफ़ेद चमचमाती होंडा एक्टिवा।
रिशब नें मुस्कुराते कहा,"एनफील्ड थी बस दिव्या थोड़े थी।"

लप्रेक ११


धूधली सी शाम में श्याम के कंधों पर सर रखकर बैठी थी। काफी देर तक की खामोशी को चीरते हुए। नीतू नें आसमान में आकृति दिखाते हुए कहा चलो न उस बादल के पीछे चले। एक बादल से दूसरे पर आइस-पाइस खेलेंगे। 


तुम सूरज ओढ़ लेना मैं चाँद पॉकेट में छुपा लूँगी। फिर अदला बदली करेंगे दोनों का। ले जाऊँगी बहुत दूर मेरी नानी के गाँव में ये चाँद गड्ढे में छुपा दूँगी। फिर चाँद दिन पूरी करने ना आएगा। और मैं तुम्हारे साथ यहीं पूरे एक दिन एक सौ बरस जैसे गुज़ार दूँगी।

- मिश्रा राहुल

लप्रेक १०



रेनॉल्ड्स 045 अब तो सफ़ेद से पीला पड़ गया हैं। करन नें उसकी नीली कैप भी बड़ी सम्हाल के रखी। पिछले बार आशीष से उसकी कट्टी भी इसी बात पर हुई थी। उसनें एक दिन के लिए पेन उधार मांगी थी। 


करन से दिल पे पत्थर रखकर उसे एक दिन खातिर अपना रेनॉल्ड्स 045 दिया था।
 

आजकल दूकान दूकान ढूंढता है, रिफिल मिलती नहीं। लोग मजाक भी
उड़ाते अमन बदल दे अपनी राम प्यारी।
 

अमन भी पलटवार करता। गिफ्ट कभी पुराना होता है क्या। कभी प्यार करोगे समझ जाओगे हुजूर।
 

- मिश्रा राहुल

लप्रेक ९



जैसे ही कार का दरवाजा बंद होता। अंगूठे और दोनों उंगलियां सीधा म्यूजिक की वॉल्यूम नॉब ही घुमाती।

आवाज़ धीरे धीरे तेज़ होती की कैसेट को फ़ास्ट फारवर्ड लगा दिया जाता। अक्सर दोनों में इसी को लेकर लड़ाई होती थी कि उसने जो पसंद के गाने पर्ची में नोट करवाये थे वो क्यों नहीं भरवाये हमने।

आजकल ड्राइव करता हूँ अकेले, बगल की सीट पर लोग बदलते जाते। आजकल साइड ए ही लगा रहता। न कोई छेड़ता ना कोई पलटता। बजता रहता फिर खुद ही बंद हो जाता या शायद मैं ख्वाब से वापस लौट आता।

सोमवार, 30 नवंबर 2015

लप्रेक ८



पूरे कापी के बंडल को उँगलियों से गिन रहा था। कापी नंबर 24 मेरी गणित के हिसाब से 30 मिनट में साइन होगी मेरी कापी। ऊपर से तिवारी सर की क्लास वो तो बिना दंडहरे छोड़ेंगे नहीं। कलाई घुमा के घड़ी देखा तो 14 मिनट छुट्टी होने में थे।

हे भगवान !! आज लेट करा दे उसकी जीप। बड़े शातिरता से उसनें तिवारी मास्टर की नज़र से बचा कर कुछ कापी की जगह अदली-बदली करदी।
जिसकी वजह से उसे तीन बेंत की सजा मिली। ये सजा तो वो चार-पाँच बेंत खाकर भी हजम कर जाता पर अगली सजा नें उसकी जान पर रेज़र मार दिया।
अब उसकी कापी सबसे आखिरी में चेक होगी।


स्कूल से निकलते ही उसनें खट्टा-मीठा बेचने वाले से इशारे सब कुछ पूछ लिया में पूछ लिया। बस क्या था उसनें निकली अपनी हरक्युलेस रेंजर साइकिल और राणा प्रताप की तरह चेतक को दौड़ाने को लगाम खींच लिया।

दूर दूर तक कोई नहीं था। पर अचानक एक कमांडर जीप दिख गयी। ऊपर से आ गयी उसकी फेवरिट शॉर्ट-कट गली। उड़ान भरता हुआ वो जा पहुंचा जीप के आगे। बस निकलती जीप के पीछे से बाय-बाय करके इशारा किया। जवाबी बाय-बाय नें तो उसका दिन बना दिया।

भूल गया तिवारी की बेंत स्कूल की लेट। मिल गयी जन्नत उसको।

- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

लप्रेक ७


कानो के दो सूराखों में झुमके भरते हुए बोला।  देखो कैसे मस्ती से झूम रहा तुम्हारे कान को पकड़ के। लाल सूरज, तरंग फ़्लाइओवर, नीचे तेज रफ्तार ट्रेन और ऊपर ये बेहतरीन अकेली हवाएँ।

हवाएँ अकेली नहीं देखो नीले बैक्ग्राउण्ड में दूर कबूतर के जोड़े खोल दिये है अपने पंख। नीचे की चिल्ल-पों से दूर वहाँ ना वहाँ पुलिस की सीटी है ना लफंगों का घूरती निगाहें।

बातें मद्धिम होती चली गयी। कबूतर के जोड़े ऊपर ही ऊपर निकल गए। बस मगरमच्छी निगाहें उस जगह को घेरने लगी।

©खामोशियाँ-2015 | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (15-अक्तूबर-2015)

सोमवार, 21 सितंबर 2015

लप्रेक ६



दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के ठीक सामने। दो अंजान गलियों से अचानक दो बिलकुल सफ़ेद रंग की ऐक्टीवा अर्ध-वृत्त बनाते हुए सरल रेखा में आ गयी। साथ ही नज़रें भी सामने से हटकर क्षैतिज पटल पर जम गयी।

सुरुचि तुम और गोरखपुर में - हाँ राजीव मैं वो भी गोरखपुर में। मेरा एसएससी का सेंटर यहीं आया। एडमिट कार्ड स्कूटी के डिग्गी से निकालते अपना नंबर ढूंढने लगी। लाओ राजीव एडमिट कार्ड तुम्हारा देख लूँ। उनसे झट से अपने शर्ट में छुपाते बोला, ओह वो तो घर भूल गया। आदत तुम्हारी बदल सकती है?? कुछ आदतें बदलने के लिए नहीं होती।

ठहाके लगाते दो जुड़वा स्कूटी में से एक लापता हो गयी। राजीव नें फोटोकॉपी दुकान पर गाड़ी धीमी की। यहाँ पर मूवी दिखाओगे सुरुचि बोल पड़ी, पता है तुम्हारे पास है एडमिट कार्ड। कुछ आदतें अपनी ऐसी ही रखना उम्र भर। गाड़ी का एक्सलरेटर तेज हो गया जा पहुंचा माया सिनेप्लेक्स।

©खामोशियाँ-2015 | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (21-सितंबर-2015)

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

लप्रेक ५



घड़ी में तीन बजे नहीं की रास्ता निहारना शुरू। बैंक रोड पर बारिश कुछ ज्यादा ही हो रही थी। लड़के की छप्पर भी टप-टप-टप। देखने के चक्कर में उसने कई ग्राहकों पर ध्यान तक नहीं दिया। उसने बस रुवांसा मुंह बनाया ही था कि ठेले पर लगे बताशों के ढ़ेर के पीछे से आकर एक बाला नें हाथ बढ़ाया।

क्लचर खोलकर उसने बालों को ऐसा झटका मारा जैसे मानो रजनीगंधा की खुशबू पूरे पांचों फ्लेवर को एक ही बना दिया।

पहले पुदीना फिर सौंफ फिर हींग। पहाड़े की तरह याद कर रखा है। हर दो पुदीने के बताशों के बीच एक मीठा मज़ा। काफी पुरानी यारी सी लगती।

प्यार तो प्यार है एक अधिक बताशे या दों के बीच एक मीठा खिलाने से भी हो जाता।

- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

लप्रेक ४



स्टूडेंट गैलरी पर एक स्टैंड पर खड़े अपनी-अपनी किताबें खंगाल रहे थे। तभी वो बोल पड़ा "जब से इश्क के रोजगार हुए है, नज्में भी सन्डे खोजती।" बोलकर चुप हो गया।

"नज्मों की दुकान नहीं खुलती, मेरा शहर सन्डे को बंद रहता।" मिल गया जवाब एक प्यारी सी हंसी देकर फुल स्टॉप लगा दिया।

रस्किन बांड और पॉल कोएल्हो पढने वाली बाला कबसे हिंदी में जुमले पढने लगी।

तुमसे बदला लेने के लिए इतना तो ख्याल रखना होगा ना मेरे मजनू। वैसे भी मिले थे बुक स्टोर पे और तुमने ही सिखाया था एक बुक को दो लोगो को पढने में प्यार बढ़ता।

तभी मेरी बुकमार्क पर तुम आगे बढ़ जाती और तुम्हारी पे मैं। दोनों ख़त्म करते तो आधी तुम पढ़ पाती आधी मैं। कुछ ऐसा करो दोनों साथ ख़त्म कर सके पूरी किताब।

©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(२०-अगस्त-२०१५)

सोमवार, 17 अगस्त 2015

लप्रेक ३


घुप अंधेरे में धर्मशाला फ्लाईओवर पार करते। उसने बस ये कहा कि रात को शहर इतना खामोश क्यूँ हो जाता है मानो चाँद इयरफोन लगाकर बातें सुनता।
जैसे दिन में शहर तेरी बक-बक से इतना शोर हो जाता की मेरी फरमाइश तुम्हारी माइक तक नहीं पहुँचती मिस आरजे। व्हाट्सएप फरमाइश नहीं चलती क्या तुम्हारे एफ़एम मे।

कभी बाजा भी दो। "प्यार तो होता है प्यार। फिल्म-परवाना"

दिनभर एक तरफा वाकी-टाकी लगाए तुम बोलते रहती। सुनो ऐसा क्यूँ न करे मैं भी दूसरे एफ़एम आरजे बन जाऊँ और फिर बातें होती रहेंगी पूरे शहर के बीचों-बीच।

दूर जाती मोटरसाइकल में दोनों की आवाज मद्धिम होते चली गयी।

©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (१६-अगस्त-२०१५)

लप्रेक २

पंद्रह अगस्त समारोह के ठीक पहले दो स्कूल हाउस कैप्टन दूर से निगहबानी कर रहे। तम्बू पर कान चिपके सारे फुसुर-फुसुर सुन रहे।

"दो मिनट तक तो आजाद रहो तुम। " शिखा ने प्यार से कहा

"कल पंद्रह अगस्त हैं ना?" रोहन ने जवाब में सवाल किया

"तो आज क्या गुलाम हो तुम??"  शिखा ने पूछा

"ये तुमसे बेहतर और कौन जानेगा।" रोहन ने कहा

"हद करते हो। तुम्हें फ़ीता तक तो बांधने का टाइम नहीं, लाओ ना मैं बांध देती हूँ।" शिखा ने कहा

दूर खड़ी पूरी स्कूल की आँखें दो घरों में एक घर बना रहे। वो तो केवल बालों की क्लिप में लगे तिरंगे को ही जाने कबका सैल्यूट मारकर परेड पूरा कर लिया।

©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (१५-अगस्त-२०१५)