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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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सोमवार, 21 सितंबर 2015

लप्रेक ६



दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय के ठीक सामने। दो अंजान गलियों से अचानक दो बिलकुल सफ़ेद रंग की ऐक्टीवा अर्ध-वृत्त बनाते हुए सरल रेखा में आ गयी। साथ ही नज़रें भी सामने से हटकर क्षैतिज पटल पर जम गयी।

सुरुचि तुम और गोरखपुर में - हाँ राजीव मैं वो भी गोरखपुर में। मेरा एसएससी का सेंटर यहीं आया। एडमिट कार्ड स्कूटी के डिग्गी से निकालते अपना नंबर ढूंढने लगी। लाओ राजीव एडमिट कार्ड तुम्हारा देख लूँ। उनसे झट से अपने शर्ट में छुपाते बोला, ओह वो तो घर भूल गया। आदत तुम्हारी बदल सकती है?? कुछ आदतें बदलने के लिए नहीं होती।

ठहाके लगाते दो जुड़वा स्कूटी में से एक लापता हो गयी। राजीव नें फोटोकॉपी दुकान पर गाड़ी धीमी की। यहाँ पर मूवी दिखाओगे सुरुचि बोल पड़ी, पता है तुम्हारे पास है एडमिट कार्ड। कुछ आदतें अपनी ऐसी ही रखना उम्र भर। गाड़ी का एक्सलरेटर तेज हो गया जा पहुंचा माया सिनेप्लेक्स।

©खामोशियाँ-2015 | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (21-सितंबर-2015)
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