बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"
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बुधवार, 22 मई 2013

गरमी...


इस तपतपाती
धरा पर
कोई इल्ज़ाम न डाल...!!

सूरज ने
एसिड लदी
बोतले उड़ेली है उसपे...!!

ज़रा छिड़्क
कमंडल खोल
दो चार बूंदे ए अब्र...!!

वरना पहुँच
जाएगी सागर
तो अक्स नहीं देख पाएगी...!!

©खामोशिया

रविवार, 31 मार्च 2013

जिंदगी:एक भंवर....लेख...!!!



कभी कभी हम अपने अनुभवों के संसार में केवल एक अकेले नाविक भाति हवाओं से लड़ते रहते हैं...उस भ्रम रुपी संसार के क्रिया कलापों के रचनाकार हम स्वंय ही होते हैं...!!!

हम लाख मन्नते कर ले किसी अन्य को अपने उस संसार की ऊष्मा में जलाने में पर हम उन्हें
 उससे परिचित नहीं करा सकते....उसके दुःख, पीड़ा, ख़ुशी, भावनाएं केवल अपने दायरे तक ही नियत रहती हैं ...हमारे अपने लिए होती हैं वो अजब दुनिया... दूसरों के लिए वह एक विचित्र अलग संसार जैसा हैं...वह उसके बारे में जान सकता है, पढ़ सकता है, सुन सकता है... परन्तु उसे महसूस कतई नहीं कर सकता...!!

ठीक ये बात उसी तरह होती जैसे हम छोटे थे ... हमारे बाबूजी बताते थे की हम लाखो मंदाकिनियों में विलीन हैं और उनमे से सिर्फ एक मन्दाकिनी में हम रहते .... और सूरज चाँद धरती आकाश आग पानी...सब सब इस परिवेश तलक ही हैं..दूसरी दुनिया में कुछ भी नहीं ...सिर्फ धुंध से धुधली तस्वीरे हैं ...जो दिखती नहीं इन नाजुक आँखों से..!!!

आज पता चला शायद वो सही थे...!!

~खामोशियाँ©

बुधवार, 13 मार्च 2013

ख्वाब...!!!



ख्वाब परिंदा ठहरा...
बड़ी आराम से...!!!
उड़ रहा ख्वाइशों के
नीले बैक्ग्राउण्ड मे...!!!

अचानक टकरा गया...
टूट गए पर उसके...!!!
छन्न से बिखर गयी...
मानो सारी कायनात...!!

ओह रूई के गोले...
रंगीन बनते जा रहे...!!!
सूरज पीला मरहम लिए
चाँद ढूढ़िया टॉर्च थामे...!!!

सभी आए हॉस्पिटल मे...
पर कमी हैं किसी की...!!!
मुकद्दर की गाड़ी पंचर हैं...
उसे कोई बुला लाओ...!!!

शनिवार, 9 मार्च 2013

खून के धब्बे ...


एक पुरानी...
जंग ओढ़े आरी...
काट रही सूरज की...
उँगलियों के नासूर..!!

नजरे छटकते ही...
और खिच गयी...!!

अब सरक रहे
लाल पानी को
थामने से क्या होगा...!!

खून के दब्बे...
बराबर मौजूद हैं
सूरज की बुशट पे...!!

साईरन बजने पहले
ही फींच देना उसे...!!

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

ऑस्कर पिस्टोरियस" और "लांस आर्मस्ट्रांग"


ऑस्कर पिस्टोरियस" और "लांस आर्मस्ट्रांग" दोनों से हमारा काफी गहरा जुडाव था...दोनों खेल के रत्न थे...पर जिंदगी की कसौटी को खेल की बुनियाद कहा तक सम्हालेगी...!!!
आदर्श और उनके पदचिन्हों को पकड़ के चलने की परंपरा अब लगता हैं खत्म कर देनी चाहिए...जब आइकॉन ही ऐसे करतूत करेंगे तो...आम आदमी से क्या अपेक्षा की जाए...!!!
बड़ी भोर में अकेले निकल गया...
मैं भला आदमी ढूढने..!!!
कौन मदद करे मेरी...
सूरज आँख मीज रहा...
सितारे सामान सैन्हार रहे...!!!

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

कांचे का खेल...!!!


बड़ी आँड़ी तिरछी रास्तों में...
बिछी हैं सकरी गलियाँ...!!!

हर मोड़ पर दस्तक देती...
अलसाई साँझों की बालियाँ...!!!

सूरज ऐंठकर बैठा दूर...
बयार पकड़ी हैं डालियाँ...!!!

कांचे के इस खेल में अक्सर...
बदल जाती हैं गोलियाँ...!!!

पकड़ भाग रहा सब मंजर...
जैसे ब्याहे जा रही डोलियाँ...!!!

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

इलाहबाद कुम्भ मेला...!!!!


त्रिवेणी के तट पर बैठा जाने कितने एहसास को अपने में लिए जा रहा हूँ...कुछ शाम की चमक हैं...साजो सजावट हैं...लोग हैं हाँ मुकुट धारी...!!!
फरवरी के चौदह तारीख...
उड़ेल रही अपनी चमक...!!!

बीहड़ो को काटते बड़ी मस्ती से...
बहती आ रही जमुना भी...
गले लगाने को आतुर संगम पर...!!!

पश्चिम की ओर बैठा सूरज...
मुहर लगा रहा सबके उपस्थिति की...!!!

कोई छुप के देख रहा बिना आये...
गंगा घुल रही जमुना में...!!!

सरस्वती मौन हैं साबुन लिए...
धुल रही सभी के पाप ...!!!

नैनी का पुल भी पहन लिया...
नयी आवरण देख मटक रहा...!!!

अकबर का किला सब कुछ साक्षी हैं इन त्रिवेदियों की हर एक कल-कल का...पूछ लेना बाद में सब कुछ हु-ब-हु बताएगा ये....सच कह रहा आज याद आ गए कुछ और पंक्तियाँ...जन कवि कैलाश गौतम की...!!!
"याद किसी की मेरे संग वैसे ही रहती हैं...
जैसे कोई नदी किसी किले से सटकर बहती हैं...!!!"

बुधवार, 2 जनवरी 2013

सूरज की गाड़ी



सेहर न आई काफी देर से जागे हम भी ..
कोई बताये कितनी लेट हैं सूरज की गाडी ..!! 

जाने कितनी ओस टपकाती अब्रों की छतरी ..
हर बूँद जला जाती कितने यादों की फुलझड़ी ..!!

मत हटा बुझी अंगीठियों को यहाँ से ..
अब भी जल उठाती हैं बुझी राखों की तस्तरी ..!!

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

सूरज की रजाई...!!!



जाने कबसे छुपा था अलाव जला के..
निकल आया आज देख बादल ओस बना के..!!

सो रहा हैं सूरज अभी तक रजाई में..
कोपले भी उदास हैं आखों पे आंसू सजा के..!!

रुमाल उठाये चलती हवाएं पोछने को..
पर थामे हैं अक्स जमी दर्द जला के..!!

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

कोहरे की रजाई...!!!

कोहरे की रजाई में लिपटी...
सुबह भी आज कुछ अलसाई हैं...!!!

बड़ी देरी से सोकर उठा सूरज भी...
उसकी चमक अभी तक...
खिड़कियों के दरक्तों में मौजूद हैं...!!!

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

सूरज का जन्मदिवस .. !!!

सबके जनम दिवस पर बधाइयां लिखते लिखते यूँ ही सोचने लगा की अगर सूरज जन्मदिन मनाये तो उसमे आखिर क्या...कमी रह जाएगी...उसे बता नहीं सकता बस लिख सकता हूँ भावनाओं की आवा पोह को जेहन में से ... !!! 

हवाओं ने फुक मारा के फूल गया गुब्बारा..
बाँध दिया उसके सिरे को पहाड़ों के टीलों से ..!!

बड़े ख़ुशी से उड़ते अब्र उसकी मांघ झाड रहे ..
पक्षी भी चल दिए लोगों को न्योता बाटने ..
चमकती बिजली लिए तैयार बर्फ का केक काटने को .. !!

कोई अकेले बैठा था मुरझाये एक कोने में ..
पर मना न सकता कोई उसको आने खातिर .. !!

उसके आते पिन लग जाएगी गुब्बारे में ...
निशा ओह्ह निशा मुमकिन नहीं बुलाना .. !!