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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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मंगलवार, 31 मई 2016

लप्रेक ९



जैसे ही कार का दरवाजा बंद होता। अंगूठे और दोनों उंगलियां सीधा म्यूजिक की वॉल्यूम नॉब ही घुमाती।

आवाज़ धीरे धीरे तेज़ होती की कैसेट को फ़ास्ट फारवर्ड लगा दिया जाता। अक्सर दोनों में इसी को लेकर लड़ाई होती थी कि उसने जो पसंद के गाने पर्ची में नोट करवाये थे वो क्यों नहीं भरवाये हमने।

आजकल ड्राइव करता हूँ अकेले, बगल की सीट पर लोग बदलते जाते। आजकल साइड ए ही लगा रहता। न कोई छेड़ता ना कोई पलटता। बजता रहता फिर खुद ही बंद हो जाता या शायद मैं ख्वाब से वापस लौट आता।
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