भोर के तारे,सांझ का आलस,रात का सूरज,पतझड़ के भौरे.... ताकते हैं हमेशा एक अजीब बातें जो लोग कहते हो नहीं सकता... चलते राहों पर मंजिल पाने को पैदल चल रहे कदमो में लिपटे धूल की परत... एक अनजाने की तरह उसे धुलने चल दिए...कितनी कशिश थी उस धूल की हमसे लिपटने की...कैसे समझाए वो...मौसम भी बदनुमा था शायद या थोड़ा बेवफा जैसा...एक जाल में था फंसा हर आदमी जाने क्यूँ पता नहीं क्यूँ समझ नहीं पाता इतना सा हकीकत...एक तिनका हैं वो और कुछ भी नहीं...कुछ करना न करना में उसे हवाओं का साथ जरूरी हैं..
बुधवार, 9 जुलाई 2014
आज की व्यथा
शरीफों ने दंगा मचा रखा है,
तिजोरियों को चंगा बना रखा है ...!!!
संसद के पंडो की बाजीगरी देखो
कमंडलो को गंदा बना रखा है...!!!
इंसाफ के तराजू पर भरोसा कहाँ
कानून को अंधा बना रखा है...!!!
पेट काटती गरीबों की खोलियों मे,
इफ्तार को धंधा बना रखा है....!!!
(०९-जुलाई-२०१४) (डायरी के पन्नो से)
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
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धंधे अपने अपने ...
जवाब देंहटाएंबहुत सही ..
वाह बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंमन को छूती हुई
संवेदनाओं को व्यक्त करती कविता---
उत्कृष्ट प्रस्तुति
बधाई ----
उम्दा
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