बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

शनिवार, 12 जुलाई 2014

नई ज़िंदगी-लघु कथा


सुबह के सात बजे थे। गर्मी के दिन बड़े सुबह से ही सूरज आग बरसाने को चले आते। कृपाल शर्मा अभी बिस्तर पर लेटे थे। एक फोल्डिंग मेज पर रखा पुराना फिलिप्स का रेडियो बड़े शान से बज रहा था।

"आज मौसम बड़ा बेईमान है बड़ा बेईमान है.... आज मौसम...!”

गीतकार : आनंद बक्षी, गायक : मोहम्मद रफी, संगीतकार : लक्ष्मीकांत प्यारेलाल.....कृपाल शर्मा जी बिस्तर से अंगड़ाई लेते लेते बोल ही रहे थे कि रेडियो ने चुप्पी साध ली। बजते बजते रुक गया।

"अरे जी क्यूँ नहीं बदल डालते ये खटारा रेडियो। जब तक पटको ना चलना शुरू ही नहीं करता।" श्रीलता ने हँसते हुए कहा

शर्मा जी थोड़े उत्तेजित होकर बोले, "बूढ़ा तो मैं भी हो गया हूँ कुछ साल मे रिटायर होने को हूँ फिर हमे भी बदल लेना। अरे भाग्यवान, ये हमारे शादी की निशानी है ऐसे कैसे बदल दूँ इसने जाने कितने गाने सुनाया है हमे। हँसाया है....रुलाया है....पुचकारा है.... चिढ़ाया है। यादों का पूरा खजाना है ये "

श्रीलता ने बाल सुलझाते हुए बोला, "बस करो अपनी फिलोस्फी मेरे समझ नहीं आती औरों को भी देख चला करो दुनिया एमपी3...वॉकमैन तक चली गयी और ये रेडियो ढो रहे।" अच्छा जल्दी करिए ऑफिस को लेट होंगे।

शर्मा जी मुंह मे ब्रश फंसाए सारे कमरे की तलाशी ले ली। ओह भाग्यवान, सुनती हो "संजीत नहीं दिख रहा कहीं पर भी। चला गया क्या वो मिला नहीं मुझसे इस बार भी जाने से पहले।"

श्रीलता ने किचेन से आवाज़ लगाई, "हाँ चला गया!! वो रहता ही कितना देर है अब काम होता तो आता, काम रहता तो बात करता। खैर जाने दीजिये ना अब बड़ा हो गया है अच्छा-बुरा समझता। जीने दीजिये उसको उसकी ज़िंदगी और आपके लिए हम है ना।"

वो तो सही है भाग्यवान पर पुराने दिन जेहन से हटते नहीं, जब उसकी टूटी साइकिल को मैं एक कंधे पर उठाकर और दूसरे पर उसको लिए बाजार जाया करता था। पर क्या आज उसी नयी ऊड़ी मे बैठने के लिए मैं फटीचर हो गया हूँ।

"शर्मा जी जाने दीजिये ना, और ऊड़ी नहीं ऑडी होता है। आप भी ना अच्छा भला नाम बिगाड़ देते " श्रीलता ने पूरे माहौल के गमो को अपने आँचल से पोछकर एक हंसी की फुहार छोड़ दी। काफी हद तक यही दिनचर्या रहती थी कृपाल शर्मा और श्रीलता के दिन की।

शर्मा जी रोज की तरह आज भी अपनी बजाज चेतक स्कूटर से निकल गए। स्कूटर भी वैसे ही जिसको बिना सलामी दिये स्टार्ट कहाँ होती। फिर श्रीलता का वही रोज का ताना, जिसको खाए बिना ना शर्मा जी का खाना हजम होता था ना श्रीलता का दिन गुजरता था। यही सब छोटी-छोटी बातें ही तो होती जो रिश्तों को एक नया आयाम देती जाती।

आज दिन थोड़ा अजीब सा था और दिन जैसा तो कतई नहीं। आज सारे के सारे अशुभ संकेत किसी अनहोनी को इशारा कर रहे थे। सुबह जब मिसेज शर्मा मंदिर जा रही थी तो बिल्ली ने रास्ता आधा कर दिया, फिर आज दूध भी पतेली से बाहर आ गया, फिर बाथरूम का शीशा चटक गया। आज सारे के सारे अशुभ संकेत देख श्रीलता ने शर्मा जी को सचेत किया, पर कृपाल शर्मा रुके नहीं और निकल पड़े अपने चेतक पर।

अभी कुछ ही देर बीते थे। शर्मा जी आधे रास्ते पर थे। वहीं दूसरी तरफ से एक तेज़ी से आती यामाहा R15 ने शर्मा जी के चेतक के परखच्चे उड़ा दिये। साथ ही वो लड़का भी लहूलुहान हो कर वही दम तोड़ दिया। शर्मा जी की साँसे अभी चल रही थी, पर खून बहुत बह चुका था। इसी वजह से वो अचेत पड़े थे। लोगों ने शर्मा जी को बगल की निजी अस्पताल मे भर्ती करा दिया।

उधर, घर पर श्रीलता परेशान हो रही थी। बार बार उसकी नज़रें एक बार फोन पर जरूर अटक जाती कि अभी घंटी बजेगी। पर मन ही मन वो ईश्वर से मदद भरी आँखों से निहार भी रही थी तभी फोन की घंटी बज ही गई। जो हुआ था उसे सुनकर उसके हाथ पाँव फूलने लगे। हॉस्पिटल के कर्मचारी ने बताया कृपाल शर्मा का एक्सिडेंट हो गया है।

श्रीलता तेज़ी से भागती हुई अस्पताल पहुंची वहाँ उसे पता चला कि शर्मा जी की गाड़ी विधायक के लड़के से टकरा गयी है। साथ ही विधायक के लड़के का वहीं देहांत हो गया। सर पर चोट लगने की वजह से शर्मा जी कोमा मे चले गए।

श्रीलता को कुछ सूझ नहीं रहा था उसने संजीत को फोन मिलाया, पहली रिंग मे फोन नहीं उठा। फिर उसने हार नहीं मानी और एक नयी आस से नंबर घुमाया अबकी फोन उठ गया।

"बेटा!! संजीत पापा का एक्सिडेंट हो गया है बेटा, वो कोमा मे है।" श्रीलता ने हबसते हुए कहा
"मम्मा!! जरूरी मीटिंग है तू है ना वहाँ देख ले ना पापा को मैं आकर उन्हे सही तो कर नहीं दूंगा" संजीत ने सीधा जवाब दिया
"श्रीलता अब समझ गयी थी कि ये लड़ाई उसे अब खुद ही लड़नी होगी", उसने खुद को हिम्मत बँधाते हुए बोला

श्रीलता सोच रही थी कि अचानक ही इतना कुछ कैसे बदल सकता है। एक ओर संजीत को कोस रही थी तो दूसरी ओर भगवान को और आँसू भी सूखने मे नाकाम होते जा रहे थे। यही सब सोचते सोचते वो कब अस्पताल के बेंच पर सो गयी उसे खबर ना हुई। एक शांति जैसे पूरे वातावरण मे बस गयी।

पर शांति कहाँ ज्यादा देर टिकने वाली थी। एक तेज़ चिल्लाहट की आवाज़ ने पूरे अस्पताल को झकझोर दिया। विधायक और उसके कुछ गुर्गे अस्पताल मे बस एक ही नाम चिल्लाते आ रहे थे। कौन है कृपाल शर्मा?? कौन है कृपाल शर्मा?? और वो भी क्यूँ ना उसका जवान लड़का जो मरा है। तब तक कमरा नंबर 13 के दरवाजे पर दस्तक हुई। श्रीलता ने उठकर दरवाजा खोला।

हाँ आप कौन है?? किससे मिलना है?? श्रीलता ने गंभीरता से पूछा

"हमे मिलना-विलना नहीं है बस बताने है कि जब बुड्ढा ठीक होगा तब वो सीधा जेल मे होगा। तो तू बस यही दुआ कर कि बुड्ढा ठीक ही ना हो। तुझे तो पता ही होगा की पुलिस-कानून मेरी जेब मे ही रहता। मैं जो चाहूँ वो होगा।" बाकापा विधायक हरीश कुशवाहा ने डाइलॉग दिया और इतना बोलकर वो चला गया

श्रीलता एक भोली सी महिला को ये सब कुछ समझ नहीं आ रहा था। आखिर गलती उसके लड़के की थी जिसने शर्मा जी का ये हालत कर दी ऊपर से आके रौब जता रहा। आखिर समाज को हो क्या गया है दूषित हो चुका है पूरी तरह। वो दिन ऐसा था कि कटने का नाम ही नहीं ले रहा था। ना संजीत की मीटिंग खत्म हुई ना ही वो आया, और तो और उसका एक फोन तक भी ना आया। अब मिसेज शर्मा को अपने बेटे से चिड़ होने लगी थी।

दिन गुजरते गए। श्रीलता ने भगवान का दामन नहीं छोड़ा। माँ दुर्गा की कृपा हुई और शर्मा जी कोमा से वापस आने के साथ साथ स्वस्थ होते चले गए। एक तरफ श्रीलता ये सोच कर खुश होती की शर्मा जी ठीक हो रहे वहीं दूसरी ओर उसे हरीश कुशवाहा विधायक की धमकी भी कानो मे गूंज रही थी। उसने उसकी आँखों मे बदले की चिंगारी देखी थी। पर उसने शर्मा जी को इस बारे मे कुछ बताया नहीं सारा दर्द खुद झेल रही थी। वो उनके चेहरे की हल्की मुस्कान खोना ना चाहती थी।

पर जिसका डर था वो दिन आ ही गया। कुछ पुलिस वाले आ गए शर्मा जी को ले जाने। श्रीलता और डाक्टर ने काफी गुजारिश की, "शर्मा जी अभी चलने फिरने लायक नहीं" पर वो कहाँ सुनने वाले। सही काम पुलिस वाले कभी करते नहीं और गलत मे इतनी तेज़ी दिखाते की क्या बात हो।

श्रीलता फिर चक्रव्यूह मे फंस गयी। खुशियाँ आई भी तो बस जीभ झुठार कर चली गयी। श्रीलता ने शहर के बड़े से बड़े वकील के पास गुहार लगाई, पर कौन खड़ा होगा हरीश कुशवाहा के सामने सीधे टक्कर लेने के लिए वो भी बिना मतलब के। एक वकील खड़ा हुआ पर शायद वो नया था शहर मे और नौकरी पेशे मे भी। हरीश ने अपनी सारी तिकड़म भिड़ा के आखिर शर्मा जी को सजा दिलवा ही दी।

ये सब इतने जल्दी जल्दी हो गया की श्रीलता कुछ बर्दास्त नहीं कर पायी और अंततः उसकी नन्ही जान ने मिट्टी के शरीर को त्याग दिया। शर्माजी बहुत दुखित हुए। उनकी तो दुनिया उजड़ गयी थी बस एक दिन के एक्सिडेंट से, वो सोच रहे थे काश उन्होने श्रीलता की बात मान ली होती। एक दिन ना जाते ऑफिस आखिर क्या बिगड़ जाता, वगैरा-वगैरा। बेटा संजीत को बिन बताए ही शर्मा जी ने खुद ही श्रीलता का अंतिम संस्कार कर दिया। अब तो शर्मा जी को जीने की तमन्ना भी नहीं थी। फिर घर क्या जेल क्या, घर पे रहना तो जेल से भी दूभर था। शारीरिक कष्ट झेल लिए जाते पर यादें जो कचोटती वो दर्द असहनीय हो जाता। हर जगह हर चीज़ पर श्रीलता की यादें जुड़ी थी। यहाँ बैठ खाते थे, यहाँ बैठ झगड़ते थे। शर्मा जी जेल चले गए बस रेडियो ले गए उस घर से। जान थी उनके लिए वो रेडियो।

जेल मे भी कैदियों से उनका संबंध काफी तेज़ी से बंधता गया। शर्मा जी थे भी ऐसे व्यक्तित्व के आदमी। जो उनसे मिल लेता था मानो वो उसको अपना बना लेते थे। जेल मे कृपाल शर्मा बाबूजी के नाम से जाने जाते थे। जेल मे भी लोग बड़े जल्द बाबूजी की मुरीद होते गए।

बाबूजी-बाबूजी ये वो शब्द है जिसे वो ताउम्र सुनने को तरस रहे थे पर वो मिला कहाँ कैदियों से। बाबूजी की बात जेल मे हर कोई मानता था वो जेलर जिसको सबसे सख्त जेलर की उपाधि मिली थी वो भी नर्मदिल होता चला गया। कुछ कैदी उनके पैर दबाते, कुछ उनका सर। उन्हे तो कैदी अच्छे और दुनिया वाले बुरे नज़र आ रहे थे। उनके लिए तो गुनहगारों की परिभाषा बदल गयी थी। हरीश कुशवाहा और संजीत शर्मा ये दोनों ही तो गुनहगार थे उनके जीवन के, पर वो तो आजाद घूम रहे बाहर और ये बेचारे जो समाज की नज़र मे अपराधी हैं, चोर है, लूटेरे है वो यहाँ जेल मे पड़े है।

शर्मा जी खुश तो थे पर श्रीलता को याद कर दुखित हो जाते थे। जेल मे इतने जल्दी समय गुज़रा कुछ पता ना चला। शर्माजी को उनके बेहतर आचरण की वजह से सजा घटा दी गयी थी, उनके रिहाई का भी दिन आ गया। अब तो मानो पूरा मंज़र गमगीन हो गया। आम तौर पे ये खुशी की सौगात लाता, पर कोई भी किसी कीमत पर कृपाल शर्मा को छोडने को तैयार ना था। अब ये बात कौन कहे शर्मा जी से, कहीं शर्मा जी बुरा ना मान जाए।

जेल की चाहदीवारी पर चाँद अटक सा गया था। रात रुक सी गयी थी जैसे बढ़ने को तैयार न हो। सारे चेहरे एक दूसरे को देख रहे थे। मायूस जैसे आज किसी ने खाना तक ना खाया पूरा खाना वैसे का वैसा ही पड़ा था। शर्मा जी ने खुद भी खाना ना खाया वो तो और भी परेशान थे। जिससे दिल लगाते थे खुदा उसे ही उनसे छीन लेता था। खैर रात बीती किसी तरह।

सुबह सभी जल्दी उठ गए आखिर उन्हे शर्मा जी को विदाई जो देनी थी। शर्मा जी भी तैयार थे जाने के लिए उन्होने अपना सामान बांध लिया था। चलते-चलते उनके कदम रुक जा रहे थे। वे बार बार उन मायूस चेहरो को पलटकर देख रहे थे। सबसे गले मिलकर शर्मा जी को अनुमति दी।

"बाबूजी आप बहुत याद आओगे", सभी ने एक सुर मे कहा और कहते ही सारी आँखें नम हो गयी। शर्मा जी भी उन्हे गले लगाकर उन्हे पुचकारा। शर्मा जी निकल चुके थे।

थोड़ी देर बाद गेट पर दस्तक हुई। दरवाजा खुला तो एक छोटी कद-काठी का बुड्ढा आँखों पर काले फ्रेम का चश्मा लगाए खड़ा था। अरे शर्मा जी वापस आ गए। एक खुशी ने पूरे गमो के माहौल को बदल दिया।

शर्मा जी ने कहा किसे मैं अपना कहूँ या किसके लिए मैं बाहर जाऊँ मेरा परिवार तो यही है। ये मनोज, ये गुल्लू, ये सुनील आखिर यही तो है मेरा परिवार। मैं इस इंतज़ार मे था की तुम लोगों मे से कोई मेरा हाथ पकड़ेगा और बोलेगा "बाबूजी आप जाइए मत यही रह जाइए" पर ऐसा हुआ नहीं। तभी मैं खुद ही चला आया मेरे सारे जीवन की कमाई तुम लोगों की ही है। तुम लोग सिर्फ कैदी नहीं मेरे अपने भी हो।

सभी लोग बड़े शांत से खड़े थे और शर्मा जी का रेडियो गाए जा रहा था।

"ज़िंदगी के सफर मे गुज़र जाते है जो मुकाम वो फिर नहीं आते"
“गीतकार : आनंद बक्षी, गायक : किशोर कुमार, संगीतकार : आर डी बरमन.....” शर्मा जी ने भुनभुनाया।

शर्मा जी ने आसमान की ओर देखकर बस इतना कहा इंसान मजबूरी मे काफी गुनाह कर जाता हर आदमी उतना बुरा नहीं होता जितना समाज दिखाता। पर भगवान तू सजा थोड़ा गलत दे जाता। मेरी ज़िंदगी मे जो अच्छे है सज़ा उन्हे ही ज्यादा दी तूने क्यूँ...???

श्रीलता आज तुम्हें कितना याद कर रहा मैं।
- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

4 टिप्‍पणियां:

  1. आप की ये खूबसूरत रचना...
    दिनांक 14/07/2014 की नयी पुरानी हलचल पर लिंक की गयी है...
    आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित हैं...आप के आगमन से हलचल की शोभा बढ़ेगी...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर...

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  2. ब्लॉग बुलेटिन आज की बुलेटिन, थम गया हुल्लड़ का हुल्लड़ - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. सच कहा आपने! आज जेल मे बहुत से लोग ऐसे है जिनसे बहुत छोटा सा अपराध हुआ है या कुछ तो ऐसे भी होंगे जिन्होने कोई अपराध ही नही किया है !

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  4. The Diary Story is an attempt to attract the Hindi Story Lovers. The one who loves Stories. But Lacking in time to read it. The Story recitation is done in such way to make you feel deep into your heart..!!
    If you're a story writer mail me at misra.rahul.ec@gmail.com if it impressed me then in next episode your story will be recitated in myself...!!
    - Misra Raahul
    (Bloggist And Writer)

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