बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

सोमवार, 28 जुलाई 2014

इंसानियत


वो कटते है वो मरते हैं,
बातें अदब की करते हैं।

मंदिर-मस्जिद आगे करके,
चर्चे साहब सी करते हैं।

घंटे-अज़ान की राग बताके,
दंगे मजहब की करते हैं।

मिलता है क्या इनसे इनको,
रातें बेढब सी करते हैं।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२८-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

4 टिप्‍पणियां: