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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

आपका वजूद


अनर्गल बातों मे घुसना छोड़िए,
चलती चक्की में पिसना छोड़िए।

आपका वजूद आपकी सादगी है,
नए सलीकों में फंसना छोड़िए।

गलती हो गयी तो मान लीजिये,
बेवजह दूसरों को कोसना छोड़िए।

जरा आराम से काटिए सुबह-शाम
रोज़ रोज़ जिंदगी को घिसना छोड़िए।

किस्मत लकीरों की मोहताज नहीं
उसी को पकड़ के सोचना छोड़िए।
______________________
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२५-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)
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1 टिप्पणी:

  1. क्या बात है......थोडा सा रूमानी हो जाएँ.....बहुत खुबसूरत भाव को शब्द दिए हैं आपने

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