Receive all updates via Facebook. Just Click the Like Button Below...

Get this Here

अपनी खामोशियाँ खोजे

Google+ Followers


बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

समर्थक

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

डायरी


कभी कभी
भूल जाता,
पन्ने लिखना
डायरी के।

दिन हर रोज़
एक सा ही तो रहता।
सुबह के अखबार से,
रात की खामोशी तक।

आखिर,
कॉपी-पेस्ट ही
तो करते है हम।

आस की लाईमलाइट
मे आज भी चलती है,
सपनों की रील।

आजकल,
रिवाइंड बटन
काम नहीं करता।
_____________________
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२२-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)
Comment With:
OR
The Choice is Yours!

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर शब्दानुभूति

    उत्तर देंहटाएं
  2. लगता है ये कविता मेरे लिए रची गई है.. मन को छू कर निकल गई...

    उत्तर देंहटाएं