बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

बुधवार, 9 जुलाई 2014

आज की व्यथा


शरीफों ने दंगा मचा रखा है,
तिजोरियों को चंगा बना रखा है ...!!!

संसद के पंडो की बाजीगरी देखो
कमंडलो को गंदा बना रखा है...!!!

इंसाफ के तराजू पर भरोसा कहाँ
कानून को अंधा बना रखा है...!!!

पेट काटती गरीबों की खोलियों मे,
इफ्तार को धंधा बना रखा है....!!!

(०९-जुलाई-२०१४) (डायरी के पन्नो से)
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल

4 टिप्‍पणियां:

  1. आप की ये खूबसूरत रचना...
    दिनांक 10/07/2014 की नयी पुरानी हलचल पर लिंक की गयी है...
    आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित हैं...आप के आगमन से हलचल की शोभा बढ़ेगी...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर...

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  2. वाह बहुत सुन्दर
    मन को छूती हुई
    संवेदनाओं को व्यक्त करती कविता---
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    बधाई ----

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