हर रात के बाद एक उजाला मांगती जिंदगी में जाने कितने ऐसे क्यूँ आ जाते जिनका जवाब शायद इस कायनात में नहीं मिल पाता...मरहम तो मरहम दर्द भी चलते रहते उनके ना होने पर लोग उन्हें भी खोजते...और कुछ दर्द की परिकाष्ठा का माप तो छितिज तक ही मिलता...जो न कभी धरा पर मिला हैं और न ही कभी मिलेगा...!!!शब रोती रह गयी पर कोई मनाने न आया,
चाँद टंगा फलक पर कोहनी बल चला आया...!!!
झील तो सो रहा था साँसे रोक कर ऐसे,
किसी का टपका आंसू उसे जगा आया...!!!
साहिलों पर अक्सर औंहाते सींप दिखे,
उन्होंने भी उसको कुछ बहला फुसलाया...!!!
अब तो आ गया सूरज टीले पर चढ़ने,
लगता उसी ने हमारी शब हैं भगाया...!!!
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