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अपनी खामोशियाँ खोजे

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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

जिंदगी की चाय..!!!


सुबह उठाते ही एक आस के साथ पहुच जाते लोग चाय के मैखानो में...जैसे कितना नशा होता उसमे और बहकते हुए खोजते छप्पर जिसके तले कंडे पर उबलती हुई चाचा की चाय...साथ में वो पड़े रगीन अखबार आकर्षित करते सबको झपटने पर...!!!
बड़ी अकेले सी जिंदगी चाय पीने निकली...
एक फटे पुराने छप्पर में रुककर वो...!!

अपने पुराने अल्फाजो को प्याले में डुबोकर,
कैसे उसे आराम से निगल रही...!!!

उसपे भी रो रहे चाचा की छत,
को ताक कर कुछ उसे इशारा करती...!!!

केतली से निकलती इलायची की अश्क,
उसे पकड़ कर जाने कहा सोच रही...!!!

गरमागरम चुस्की लेने को बेताब,
होंठो से दर्द फूँक फुंककर मिला रही..!!!
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