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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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गुरुवार, 5 मार्च 2015

हसरतें



कुछ हसरतें पूरी हुई भी तो कीमत ले गयी,
सारे ज़िंदगी की कमाई थी मेहनत ले गयी।

बस कुछ मुट्ठी भर ही थे अपने भी सपने,
उन्हे देखने की उठाई थी हिम्मत ले गयी।

अपना कहने से भी डरने लगा हूँ मैं अब तो,
हमारी बरसों की बनाई थी हुकूमत ले गयी।

हाथों में संजोएँ रखा था दुवाएँ जिसके लिए,
पुरानी बस्ती की सजाई थी अमानत ले गयी।

कलम चले भी तो गुनाह सा लगता अब तो,
टूटे अल्फ़ाज की सताई थी किस्मत ले गयी।
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©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (६-मार्च-२०१५)
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