ओवरटाइम


ओवरटाइम करते करते रात के 9 बज गए थे। शोभा नें बाहर झांक कर देखा। ऑफिस के बाहर की गालियां एकदम सूनसान सी दिख रही थी। जल्दी से शोभा नें अपना सेलफोन निकाला पर ध्यान ना देने के वजह से वो भी लाल-बैटरी दिखा रहा था। जैसे ही उसने अपने दोस्त को फोन लगाने की कोशिश की फोन की चमकती स्क्रीन अचानक से मौन हो गयी।
दूर-दूर तक धीमे कदम से चलते हुए अपने दोनों हाथो को क्रॉस करके अपनी फ़ाइल सीने से लगाए सहमे हुए चली जा रही थी।

ऑटो-स्टैंड पर बड़ी देर इंतज़ार करने के बाद भी ऑटो नहीं मिला। शोभा अकेले पैदल घर जाने का जोखिम उठा नहीं सकती थी। वो कोसे जा रही थी, कभी खुद को कभी बॉस को। एक दिन काम नहीं करती तो क्या हो जाता। आज अगर कुछ हो गया तो उसका क्या होगा। जाने कितने सारे ख्याल उसको एक-बाद एक घेरे जा रहे थे। वो किसी अंधेरे घने जंगल में जैसे फंस गयी थी। आज कुछ ठीक नहीं लग रहा था उसको।

तभी पीछे के तेज़ हॉर्न नें शोभा को अपने सोच से बाहर आने को मजबूर कर दिया। तीन लफंगे दोस्त उसके बगल से बड़ी तेज़ मोटरसाइकल चलाते हुए गुजरे।

शोभा को तो जैसे करेंट लग गया। सन्न सा हो गया उसका पूरा बदन। पर किसी तरह उसने खुद को मजबूत किया। पर उसने देखा मोटरसाइकल कुछ दूर जाकर रुक गयी थी। साथ ही साथ यू-टर्न लेकर उसके पास आते जा रही थी।

इधर मोटरसाइकल पास आते जा रही थी उधर शोभा की सांसें तेज़ भागते जा रही थी। उसके कदम और तेज़ हो गए मोटरसाइकल की आवाज़ शोभा की कानो को चुभते जा रही थी। अब शोभा लगभग भाग रही थी और तेज़ बहुत तेज़ बिना पीछे देखे सीधा और सीधा।
अचानक लाइट बूझ गयी मोटरसाइकल रुक गयी इधर शोभा के कदम भी थम गए।

पीछे से एक आवाज़ आई

"शोभा... हैलो....!!"

शोभा को अपना नाम किसी अजनबी से सुनकर बड़ा अजीब सा लगा। उसने पलट कर देखा तो आयुष खड़ा था।

"ओह आयुष तुम....!!"....शोभा झट से उसके गले लगकर फफकने लगी। आज तुम ना होते तो क्या हो जाता।

"शोभा...कूल डाउन....रिलैक्स कुछ नहीं होता।" आयुष नें कहा

हर बार भगवान किसी ना किसी को आयुष बनाकर जरूर भेजते। उसने शोभा के आँसू को पूछते हुए कहा।
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ओवरटाइम | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (२२-मार्च-२०१५)

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