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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

रूबिक्स क्यूब


ज़िंदगी
रूबिक्स क्यूब
जैसी घूमती रहती।

लाल के इर्द गिर्द,
हरे रिश्ते उलझे रहते।

सफ़ेद शांत छुपा,
अकेले बैठा रहता।

पीला जिद्दी ठहरा,
नीले का पीछा करता।

जितना
सुलझाना चाहो,
उतना उलझती जाती।

अपने कुछ पास आते,
तो दूसरे उसे बिगाड़ देते।

- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)
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6 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के - चर्चा मंच पर ।।

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  2. रुबीक्स क्यूब का बढ़िया वर्णन.... जिंदिगी की तरहा

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  3. वाह क्या बात है बहुत सुंदर रचना. पढ़ कर एक नहीं उर्जा सी आ गई मन में !

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