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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

अपना


दिन में भी सपना सा लगता है,
कोई आज अपना सा लगता है।

कदम बहकते हुए दिखते है मेरे,
कोई साज अपना सा लगता है।

चेहरे महकते हुए दिखते है मेरे,
कोई राज अपना सा लगता हैं।

नखरे बलखते हुए दिखते है मेरे,
कोई ताज अपना सा लगता है।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (२७-सितंबर-२०१४)
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7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (03.10.2014) को "नवरात महिमा" (चर्चा अंक-1755)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनायें।

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  2. आपकी लिखी रचना शनिवार 04 अक्टूबर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  3. क्या बात है.....बहुत ही खास एहसासों को समेटे हैं यह पंक्तियाँ।

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  4. bahut khubsurat likha hai aapne rahul ji
    mere blog par bhi aapka swagat hai
    http://iwillrocknow.blogspot.in/

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