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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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गुरुवार, 31 जुलाई 2014

१० पैसे की दुआएँ - लघु कथा

काफी पहले की बात है काफी छोटा था मैं। सुबह अभी-अभी जागी थी। चारो तरफ लोग मधुर बेला का मज़ा ले रहे थे। लोग व्यस्त थे अपने में ही। मैं अभी चाय की प्याली लेकर पहली चुस्की लेने को तैयार था कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने उठकर दरवाजा खोला। देखा फटे चिथड़े से लिपटी एक वृद्धा खड़ी थी। आंखो में उसकी सारी परेशानियाँ देखी जा सकती थी। मैं उन्हे थोड़ी देर तक देखता ही रह गया। फिर उनके कटोरे पर नज़र गयी। उसमे सिर्फ १० पैसे पड़े थे। मेरा घर मुहल्ले में काफी घरों बाद में पड़ता है। मैं यही सोचने लगा कि क्या आज दुनिया इतनी एडवांस हो चुकी हैं कि नई मूवी देखने में वो बालकनी लेते डीसी नहीं, आइसक्रीम नए फ्लेवर की ही खाते भले उसमे ५०-६० रुपए अधिक गवाने पड़े। लेकिन वृद्धा के कटोरे को देख कर लगा कि मुहल्ले वाले तो सारे गरीब हैं।

मैं अंदर गया और अम्मा से बोला। बाहर देखिये कोई आया है उन्हे कुछ दे दीजिये। अम्मा ने १० रूपए दिये। मैं सोचा इन दस रुपए से आखिर उनका क्या होगा। अम्मा मेरी हालत समझ चुकी थी। उसने तुरंत १० रुपए मे दो शून्य और जोड़ दिये। मैं भी खुशी खुशी उन्हे देने को गया मुझे लगा आज आशीर्वाद मिलेगा बहुत ज्यादा। आखिर इंसान को और क्या चाहिए आशीर्वाद ही तो ताकि वो आगे बढ़ सके, नाम कमा सके। यही सब सोचते मैं वृद्धा के समीप आ गया।

मैंने बोला, "दादी ये लीजिये १००० रुपए। इससे कुछ दिन तो आप आराम से गुज़ार सकेंगी।"
वृद्धा ने जवाब दिया, "मैंने आज तक भीख नहीं मांगा बेटा, इसलिए मुझे इसे लेने में लज्जा आ रही। आज अगर मेरा बेटा जिंदा होता तो वो मुझे इस हाल में नहीं छोड़ता।"
मैं बड़े पेसोपेस में फंस गया। छोटा सा तो था मैं इतनी सब बातें मेरे भेजे की परिधि से बाहर की थी।

फिर भी मैंने प्रयास किया,"दादी मेरे पास एक उपाए है।"
उन्होने से आश्चर्य से पूछा,"क्या"
मैं जवाब दिया,"दादी आप मुझे अपना १० पैसा दे दीजिये और मैं आपको ये दे दूंगा। दोनों पैसे ही तो है इंसान के द्वारा बनाए। आखिर दोनों में फर्क क्या केवल दो शून्य का। वैसे भी शून्य का कोई वजूद नहीं होता।"

वृद्धा समझ गयी थी कि आज बच्चा उन्हे वो दे कर रहेगा। थोड़ी देर तक उन्होने सोचा फिर मुझे गले लगा लिया।

आँसू रुक नहीं रहे थे। झरते ही जा रहे थे। आज जब भी मैं वो १० पैसे देखता हूँ तो सोचता आखिर ये उनके दस पैसे ही तो थे जिसने मुझे आज इतना समजदार बना दिया कि मैं दुनिया को परख सकूँ /समझ सकूँ ।

तो दुआ ही तो थी दादी की बस १० पैसे की दुवा।
____________________________
१० पैसे की दुआएँ - लघु कथा
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(३१-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

बुधवार, 30 जुलाई 2014

सूनी वादियाँ - Maestro Productions



सूनी वादियों से कोई पत्ता टूटा है,
वो अपना बिन बताए ही रूठा है।

लोरी सुनाने पर कैसे मान जाए,
वो बच्चा भी रात भर का भूखा है।

बिन पिए अब होश में रहता कहाँ,
वो साकी ऐसा मैखानो से रूठा है।

मुसाफ़िर बदलते रहे नक्शे अपने,
वो रास्ता भी आगे बीच से टूटा है।

रात फ़लक से शिकायत कौन करे,
कोने का तारा अकेले क्यू रूठा है।

©खामोशियाँ-२०१४/मिश्रा राहुल
(३०-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नों से)

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

Rule Book - An Overload


सख्त नियम/जटिल कायदे/उलझा इंसान।
कायदे कानून में बंधा चेहरा। किताबी बातों से लदा इंसान।

हमने थोपे है अपने कायदे दूसरों पर। कुछ ऐसे बंधन जिसकी कभी जरूरत नहीं थी। जिंदगी को गुरुकुल जैसे जिया है हमने। कुछ किताबी आदर्श/कुछ व्यवहारिक परम्पराओं को ढोते आए हैं। ऐसा नहीं है सब अनर्गल था, पर इसकी वजह से मेरी जो छवि है वो कड़क शासक के रूप में बन गयी हैं। या कभी-कभी तो लोग घमंडी तक की संज्ञा दे जाते।

हाँ। हमने अपनी रूल बुक के हर पन्ने को साकार करने की कोशिश की हैं। कामयाब हुआ हूँ की नहीं ये तो शर्वशक्तिमान महाकाल ही बता पाएंगे।

अब इस छवि को बदलने का समय आ गया।
हाँ हे ईश्वर !! मुखौटे नहीं लगाए है हमने कभी भी। वही किया जो वक़्त की अदायगी थी। लेकिन अब और इस किताब को ढोना मुमकिन नहीं। काफी भारी हो चुकी है ये पन्ने जुडते गए हैं इसमे। मायने/एहसास/विचार/कायदे सब एक दूसरे से लड़ रहे। किन्ही दो मजहब के इंसान के जैसे।

Rule Book - An Overload
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(३०-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो पे)

इंसान


इंसान जलती
भट्टी होता।

लोग सेंकते
अपनी रोटी,
बारी बारी से।

कभी किसी की
रोटी जलती,
तो कभी
किसी का हाथ।

फिर भी बड़े
प्रेम से खिलाता,
दिन का निवाला।

खाकर फिर
प्यार से देखते,
रोती  भट्टी
राख़ रहती तबतक।

©खामोशियाँ-२०१४ // मिश्रा राहुल
(३०-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

सोमवार, 28 जुलाई 2014

इंसानियत


वो कटते है वो मरते हैं,
बातें अदब की करते हैं।

मंदिर-मस्जिद आगे करके,
चर्चे साहब सी करते हैं।

घंटे-अज़ान की राग बताके,
दंगे मजहब की करते हैं।

मिलता है क्या इनसे इनको,
रातें बेढब सी करते हैं।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२८-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

आपका वजूद


अनर्गल बातों मे घुसना छोड़िए,
चलती चक्की में पिसना छोड़िए।

आपका वजूद आपकी सादगी है,
नए सलीकों में फंसना छोड़िए।

गलती हो गयी तो मान लीजिये,
बेवजह दूसरों को कोसना छोड़िए।

जरा आराम से काटिए सुबह-शाम
रोज़ रोज़ जिंदगी को घिसना छोड़िए।

किस्मत लकीरों की मोहताज नहीं
उसी को पकड़ के सोचना छोड़िए।
______________________
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२५-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

डायरी


कभी कभी
भूल जाता,
पन्ने लिखना
डायरी के।

दिन हर रोज़
एक सा ही तो रहता।
सुबह के अखबार से,
रात की खामोशी तक।

आखिर,
कॉपी-पेस्ट ही
तो करते है हम।

आस की लाईमलाइट
मे आज भी चलती है,
सपनों की रील।

आजकल,
रिवाइंड बटन
काम नहीं करता।
_____________________
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२२-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

बड़ा दूभर है आजकल..


शब्दों की बगिया में घुसना,
बड़ा दूभर है आजकल..!!
यादों को पैरो तले रौदना,
बड़ा दूभर है आजकल....!!

सुना....अब कोई आता नहीं,
सुना....अब कोई जाता नहीं,
बूढ़ी तख्त पर अकेले बैठना,
बड़ा दूभर है आजकल....!!

खर्राटों के सुरीले गानो से,
सन्नाटो के कटीले तारो से,
सर झुकाकर खुद निकलना,
बड़ा दूभर है आजकल....!!

सब सामने लूटते देखना,
बड़ा दूभर है आजकल....!!
सब सामने कटते देखना,
बड़ा दूभर है आजकल....!!
____________________
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(१८-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

बुधवार, 16 जुलाई 2014

हर तर्को का यजमान हूँ मैं....!!!

बस आकड़ों से खेलता रहता,
हर चर्चों का मेहमान हूँ मैं....!!
अकेले सैंकड़ों से लड़ता रहता,
हर तर्को का यजमान हूँ मैं....!!!

अमेरिका से इंग्लैंड पहुंचता,
रूस से उठता ज्वार हूँ मैं...!!!
वीटो-पावर लिस्ट दिखाता,
थका हारा हिंदुस्तान हूँ मैं...!!!

आर्मी अपनी कभी ना देखता,
फ्रांस को करता सलाम हूँ मैं...!!
अग्नि अपनी कभी ना सेंकता...
चीन का करता गुणगान हूँ मैं....!!!

चाय की चुस्की पर देश गटकता,
चाचा के ढाबे की शान हूँ मैं....!!
हर रोज़ सुबह तो यही पहुंचता...
थका हारा हिंदुस्तान हूँ मैं....!!!
________________

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(१६-०७-२०१४) (डायरी के पन्नो से)

शनिवार, 12 जुलाई 2014

नई ज़िंदगी-लघु कथा


सुबह के सात बजे थे। गर्मी के दिन बड़े सुबह से ही सूरज आग बरसाने को चले आते। कृपाल शर्मा अभी बिस्तर पर लेटे थे। एक फोल्डिंग मेज पर रखा पुराना फिलिप्स का रेडियो बड़े शान से बज रहा था।

"आज मौसम बड़ा बेईमान है बड़ा बेईमान है.... आज मौसम...!”

गीतकार : आनंद बक्षी, गायक : मोहम्मद रफी, संगीतकार : लक्ष्मीकांत प्यारेलाल.....कृपाल शर्मा जी बिस्तर से अंगड़ाई लेते लेते बोल ही रहे थे कि रेडियो ने चुप्पी साध ली। बजते बजते रुक गया।

"अरे जी क्यूँ नहीं बदल डालते ये खटारा रेडियो। जब तक पटको ना चलना शुरू ही नहीं करता।" श्रीलता ने हँसते हुए कहा

शर्मा जी थोड़े उत्तेजित होकर बोले, "बूढ़ा तो मैं भी हो गया हूँ कुछ साल मे रिटायर होने को हूँ फिर हमे भी बदल लेना। अरे भाग्यवान, ये हमारे शादी की निशानी है ऐसे कैसे बदल दूँ इसने जाने कितने गाने सुनाया है हमे। हँसाया है....रुलाया है....पुचकारा है.... चिढ़ाया है। यादों का पूरा खजाना है ये "

श्रीलता ने बाल सुलझाते हुए बोला, "बस करो अपनी फिलोस्फी मेरे समझ नहीं आती औरों को भी देख चला करो दुनिया एमपी3...वॉकमैन तक चली गयी और ये रेडियो ढो रहे।" अच्छा जल्दी करिए ऑफिस को लेट होंगे।

शर्मा जी मुंह मे ब्रश फंसाए सारे कमरे की तलाशी ले ली। ओह भाग्यवान, सुनती हो "संजीत नहीं दिख रहा कहीं पर भी। चला गया क्या वो मिला नहीं मुझसे इस बार भी जाने से पहले।"

श्रीलता ने किचेन से आवाज़ लगाई, "हाँ चला गया!! वो रहता ही कितना देर है अब काम होता तो आता, काम रहता तो बात करता। खैर जाने दीजिये ना अब बड़ा हो गया है अच्छा-बुरा समझता। जीने दीजिये उसको उसकी ज़िंदगी और आपके लिए हम है ना।"

वो तो सही है भाग्यवान पर पुराने दिन जेहन से हटते नहीं, जब उसकी टूटी साइकिल को मैं एक कंधे पर उठाकर और दूसरे पर उसको लिए बाजार जाया करता था। पर क्या आज उसी नयी ऊड़ी मे बैठने के लिए मैं फटीचर हो गया हूँ।

"शर्मा जी जाने दीजिये ना, और ऊड़ी नहीं ऑडी होता है। आप भी ना अच्छा भला नाम बिगाड़ देते " श्रीलता ने पूरे माहौल के गमो को अपने आँचल से पोछकर एक हंसी की फुहार छोड़ दी। काफी हद तक यही दिनचर्या रहती थी कृपाल शर्मा और श्रीलता के दिन की।

शर्मा जी रोज की तरह आज भी अपनी बजाज चेतक स्कूटर से निकल गए। स्कूटर भी वैसे ही जिसको बिना सलामी दिये स्टार्ट कहाँ होती। फिर श्रीलता का वही रोज का ताना, जिसको खाए बिना ना शर्मा जी का खाना हजम होता था ना श्रीलता का दिन गुजरता था। यही सब छोटी-छोटी बातें ही तो होती जो रिश्तों को एक नया आयाम देती जाती।

आज दिन थोड़ा अजीब सा था और दिन जैसा तो कतई नहीं। आज सारे के सारे अशुभ संकेत किसी अनहोनी को इशारा कर रहे थे। सुबह जब मिसेज शर्मा मंदिर जा रही थी तो बिल्ली ने रास्ता आधा कर दिया, फिर आज दूध भी पतेली से बाहर आ गया, फिर बाथरूम का शीशा चटक गया। आज सारे के सारे अशुभ संकेत देख श्रीलता ने शर्मा जी को सचेत किया, पर कृपाल शर्मा रुके नहीं और निकल पड़े अपने चेतक पर।

अभी कुछ ही देर बीते थे। शर्मा जी आधे रास्ते पर थे। वहीं दूसरी तरफ से एक तेज़ी से आती यामाहा R15 ने शर्मा जी के चेतक के परखच्चे उड़ा दिये। साथ ही वो लड़का भी लहूलुहान हो कर वही दम तोड़ दिया। शर्मा जी की साँसे अभी चल रही थी, पर खून बहुत बह चुका था। इसी वजह से वो अचेत पड़े थे। लोगों ने शर्मा जी को बगल की निजी अस्पताल मे भर्ती करा दिया।

उधर, घर पर श्रीलता परेशान हो रही थी। बार बार उसकी नज़रें एक बार फोन पर जरूर अटक जाती कि अभी घंटी बजेगी। पर मन ही मन वो ईश्वर से मदद भरी आँखों से निहार भी रही थी तभी फोन की घंटी बज ही गई। जो हुआ था उसे सुनकर उसके हाथ पाँव फूलने लगे। हॉस्पिटल के कर्मचारी ने बताया कृपाल शर्मा का एक्सिडेंट हो गया है।

श्रीलता तेज़ी से भागती हुई अस्पताल पहुंची वहाँ उसे पता चला कि शर्मा जी की गाड़ी विधायक के लड़के से टकरा गयी है। साथ ही विधायक के लड़के का वहीं देहांत हो गया। सर पर चोट लगने की वजह से शर्मा जी कोमा मे चले गए।

श्रीलता को कुछ सूझ नहीं रहा था उसने संजीत को फोन मिलाया, पहली रिंग मे फोन नहीं उठा। फिर उसने हार नहीं मानी और एक नयी आस से नंबर घुमाया अबकी फोन उठ गया।

"बेटा!! संजीत पापा का एक्सिडेंट हो गया है बेटा, वो कोमा मे है।" श्रीलता ने हबसते हुए कहा
"मम्मा!! जरूरी मीटिंग है तू है ना वहाँ देख ले ना पापा को मैं आकर उन्हे सही तो कर नहीं दूंगा" संजीत ने सीधा जवाब दिया
"श्रीलता अब समझ गयी थी कि ये लड़ाई उसे अब खुद ही लड़नी होगी", उसने खुद को हिम्मत बँधाते हुए बोला

श्रीलता सोच रही थी कि अचानक ही इतना कुछ कैसे बदल सकता है। एक ओर संजीत को कोस रही थी तो दूसरी ओर भगवान को और आँसू भी सूखने मे नाकाम होते जा रहे थे। यही सब सोचते सोचते वो कब अस्पताल के बेंच पर सो गयी उसे खबर ना हुई। एक शांति जैसे पूरे वातावरण मे बस गयी।

पर शांति कहाँ ज्यादा देर टिकने वाली थी। एक तेज़ चिल्लाहट की आवाज़ ने पूरे अस्पताल को झकझोर दिया। विधायक और उसके कुछ गुर्गे अस्पताल मे बस एक ही नाम चिल्लाते आ रहे थे। कौन है कृपाल शर्मा?? कौन है कृपाल शर्मा?? और वो भी क्यूँ ना उसका जवान लड़का जो मरा है। तब तक कमरा नंबर 13 के दरवाजे पर दस्तक हुई। श्रीलता ने उठकर दरवाजा खोला।

हाँ आप कौन है?? किससे मिलना है?? श्रीलता ने गंभीरता से पूछा

"हमे मिलना-विलना नहीं है बस बताने है कि जब बुड्ढा ठीक होगा तब वो सीधा जेल मे होगा। तो तू बस यही दुआ कर कि बुड्ढा ठीक ही ना हो। तुझे तो पता ही होगा की पुलिस-कानून मेरी जेब मे ही रहता। मैं जो चाहूँ वो होगा।" बाकापा विधायक हरीश कुशवाहा ने डाइलॉग दिया और इतना बोलकर वो चला गया

श्रीलता एक भोली सी महिला को ये सब कुछ समझ नहीं आ रहा था। आखिर गलती उसके लड़के की थी जिसने शर्मा जी का ये हालत कर दी ऊपर से आके रौब जता रहा। आखिर समाज को हो क्या गया है दूषित हो चुका है पूरी तरह। वो दिन ऐसा था कि कटने का नाम ही नहीं ले रहा था। ना संजीत की मीटिंग खत्म हुई ना ही वो आया, और तो और उसका एक फोन तक भी ना आया। अब मिसेज शर्मा को अपने बेटे से चिड़ होने लगी थी।

दिन गुजरते गए। श्रीलता ने भगवान का दामन नहीं छोड़ा। माँ दुर्गा की कृपा हुई और शर्मा जी कोमा से वापस आने के साथ साथ स्वस्थ होते चले गए। एक तरफ श्रीलता ये सोच कर खुश होती की शर्मा जी ठीक हो रहे वहीं दूसरी ओर उसे हरीश कुशवाहा विधायक की धमकी भी कानो मे गूंज रही थी। उसने उसकी आँखों मे बदले की चिंगारी देखी थी। पर उसने शर्मा जी को इस बारे मे कुछ बताया नहीं सारा दर्द खुद झेल रही थी। वो उनके चेहरे की हल्की मुस्कान खोना ना चाहती थी।

पर जिसका डर था वो दिन आ ही गया। कुछ पुलिस वाले आ गए शर्मा जी को ले जाने। श्रीलता और डाक्टर ने काफी गुजारिश की, "शर्मा जी अभी चलने फिरने लायक नहीं" पर वो कहाँ सुनने वाले। सही काम पुलिस वाले कभी करते नहीं और गलत मे इतनी तेज़ी दिखाते की क्या बात हो।

श्रीलता फिर चक्रव्यूह मे फंस गयी। खुशियाँ आई भी तो बस जीभ झुठार कर चली गयी। श्रीलता ने शहर के बड़े से बड़े वकील के पास गुहार लगाई, पर कौन खड़ा होगा हरीश कुशवाहा के सामने सीधे टक्कर लेने के लिए वो भी बिना मतलब के। एक वकील खड़ा हुआ पर शायद वो नया था शहर मे और नौकरी पेशे मे भी। हरीश ने अपनी सारी तिकड़म भिड़ा के आखिर शर्मा जी को सजा दिलवा ही दी।

ये सब इतने जल्दी जल्दी हो गया की श्रीलता कुछ बर्दास्त नहीं कर पायी और अंततः उसकी नन्ही जान ने मिट्टी के शरीर को त्याग दिया। शर्माजी बहुत दुखित हुए। उनकी तो दुनिया उजड़ गयी थी बस एक दिन के एक्सिडेंट से, वो सोच रहे थे काश उन्होने श्रीलता की बात मान ली होती। एक दिन ना जाते ऑफिस आखिर क्या बिगड़ जाता, वगैरा-वगैरा। बेटा संजीत को बिन बताए ही शर्मा जी ने खुद ही श्रीलता का अंतिम संस्कार कर दिया। अब तो शर्मा जी को जीने की तमन्ना भी नहीं थी। फिर घर क्या जेल क्या, घर पे रहना तो जेल से भी दूभर था। शारीरिक कष्ट झेल लिए जाते पर यादें जो कचोटती वो दर्द असहनीय हो जाता। हर जगह हर चीज़ पर श्रीलता की यादें जुड़ी थी। यहाँ बैठ खाते थे, यहाँ बैठ झगड़ते थे। शर्मा जी जेल चले गए बस रेडियो ले गए उस घर से। जान थी उनके लिए वो रेडियो।

जेल मे भी कैदियों से उनका संबंध काफी तेज़ी से बंधता गया। शर्मा जी थे भी ऐसे व्यक्तित्व के आदमी। जो उनसे मिल लेता था मानो वो उसको अपना बना लेते थे। जेल मे कृपाल शर्मा बाबूजी के नाम से जाने जाते थे। जेल मे भी लोग बड़े जल्द बाबूजी की मुरीद होते गए।

बाबूजी-बाबूजी ये वो शब्द है जिसे वो ताउम्र सुनने को तरस रहे थे पर वो मिला कहाँ कैदियों से। बाबूजी की बात जेल मे हर कोई मानता था वो जेलर जिसको सबसे सख्त जेलर की उपाधि मिली थी वो भी नर्मदिल होता चला गया। कुछ कैदी उनके पैर दबाते, कुछ उनका सर। उन्हे तो कैदी अच्छे और दुनिया वाले बुरे नज़र आ रहे थे। उनके लिए तो गुनहगारों की परिभाषा बदल गयी थी। हरीश कुशवाहा और संजीत शर्मा ये दोनों ही तो गुनहगार थे उनके जीवन के, पर वो तो आजाद घूम रहे बाहर और ये बेचारे जो समाज की नज़र मे अपराधी हैं, चोर है, लूटेरे है वो यहाँ जेल मे पड़े है।

शर्मा जी खुश तो थे पर श्रीलता को याद कर दुखित हो जाते थे। जेल मे इतने जल्दी समय गुज़रा कुछ पता ना चला। शर्माजी को उनके बेहतर आचरण की वजह से सजा घटा दी गयी थी, उनके रिहाई का भी दिन आ गया। अब तो मानो पूरा मंज़र गमगीन हो गया। आम तौर पे ये खुशी की सौगात लाता, पर कोई भी किसी कीमत पर कृपाल शर्मा को छोडने को तैयार ना था। अब ये बात कौन कहे शर्मा जी से, कहीं शर्मा जी बुरा ना मान जाए।

जेल की चाहदीवारी पर चाँद अटक सा गया था। रात रुक सी गयी थी जैसे बढ़ने को तैयार न हो। सारे चेहरे एक दूसरे को देख रहे थे। मायूस जैसे आज किसी ने खाना तक ना खाया पूरा खाना वैसे का वैसा ही पड़ा था। शर्मा जी ने खुद भी खाना ना खाया वो तो और भी परेशान थे। जिससे दिल लगाते थे खुदा उसे ही उनसे छीन लेता था। खैर रात बीती किसी तरह।

सुबह सभी जल्दी उठ गए आखिर उन्हे शर्मा जी को विदाई जो देनी थी। शर्मा जी भी तैयार थे जाने के लिए उन्होने अपना सामान बांध लिया था। चलते-चलते उनके कदम रुक जा रहे थे। वे बार बार उन मायूस चेहरो को पलटकर देख रहे थे। सबसे गले मिलकर शर्मा जी को अनुमति दी।

"बाबूजी आप बहुत याद आओगे", सभी ने एक सुर मे कहा और कहते ही सारी आँखें नम हो गयी। शर्मा जी भी उन्हे गले लगाकर उन्हे पुचकारा। शर्मा जी निकल चुके थे।

थोड़ी देर बाद गेट पर दस्तक हुई। दरवाजा खुला तो एक छोटी कद-काठी का बुड्ढा आँखों पर काले फ्रेम का चश्मा लगाए खड़ा था। अरे शर्मा जी वापस आ गए। एक खुशी ने पूरे गमो के माहौल को बदल दिया।

शर्मा जी ने कहा किसे मैं अपना कहूँ या किसके लिए मैं बाहर जाऊँ मेरा परिवार तो यही है। ये मनोज, ये गुल्लू, ये सुनील आखिर यही तो है मेरा परिवार। मैं इस इंतज़ार मे था की तुम लोगों मे से कोई मेरा हाथ पकड़ेगा और बोलेगा "बाबूजी आप जाइए मत यही रह जाइए" पर ऐसा हुआ नहीं। तभी मैं खुद ही चला आया मेरे सारे जीवन की कमाई तुम लोगों की ही है। तुम लोग सिर्फ कैदी नहीं मेरे अपने भी हो।

सभी लोग बड़े शांत से खड़े थे और शर्मा जी का रेडियो गाए जा रहा था।

"ज़िंदगी के सफर मे गुज़र जाते है जो मुकाम वो फिर नहीं आते"
“गीतकार : आनंद बक्षी, गायक : किशोर कुमार, संगीतकार : आर डी बरमन.....” शर्मा जी ने भुनभुनाया।

शर्मा जी ने आसमान की ओर देखकर बस इतना कहा इंसान मजबूरी मे काफी गुनाह कर जाता हर आदमी उतना बुरा नहीं होता जितना समाज दिखाता। पर भगवान तू सजा थोड़ा गलत दे जाता। मेरी ज़िंदगी मे जो अच्छे है सज़ा उन्हे ही ज्यादा दी तूने क्यूँ...???

श्रीलता आज तुम्हें कितना याद कर रहा मैं।
- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

Tanhai-The Lonely Rhythm


Tanhai-The Lonely Rhythm
A Track from Maestro Productions
Singer: Vishaal Mishra
Lyrics: Misra Raahul
Composer: Vishaal Mishra & Misra Raahul

  


साथ तो चलता है वो मेरे
फिर भी ना वो मिलता है...!!!
पास तो रहता है वो मेरे
फिर भी ना वो मिलता है...!!!
सांस मे रहता है वो मेरे
फिर भी ना वो मिलता है...!!!

ख़यालो मे देखा उसको,
सैलाबों मे खोजा उसको,
सवालो मे पूछा उसको,
जवाबों मे जाना उसको।
ख़यालो मे देखा उसको,
सैलाबों मे खोजा उसको,
सवालो मे पूछा उसको,
जवाबों मे जाना उसको।

दिल जो कहता है उसे
वो तो सुनता ही नहीं....!!!
मैं तो हूँ यहाँ...
तू है जाने कहाँ....

बिना तेरे...जीना तो
जीना तो लगता है आसाँ कहाँ...!!

तेरे बिना...तेरे बिना
तेरे बिना...तेरे बिना
जीना नहीं...!!
तेरे बिना...तेरे बिना
तेरे बिना...तेरे बिना
जीना नहीं...!!

साथ तो चलता है वो मेरे
फिर भी ना वो मिलता है...!!!
पास तो रहता है वो मेरे
फिर भी ना वो मिलता है...!!!
सांस मे रहता है वो मेरे
फिर भी ना वो मिलता है...!!!

Download: bit.ly/thelonelyrhythm

बुधवार, 9 जुलाई 2014

आज की व्यथा


शरीफों ने दंगा मचा रखा है,
तिजोरियों को चंगा बना रखा है ...!!!

संसद के पंडो की बाजीगरी देखो
कमंडलो को गंदा बना रखा है...!!!

इंसाफ के तराजू पर भरोसा कहाँ
कानून को अंधा बना रखा है...!!!

पेट काटती गरीबों की खोलियों मे,
इफ्तार को धंधा बना रखा है....!!!

(०९-जुलाई-२०१४) (डायरी के पन्नो से)
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल

शनिवार, 5 जुलाई 2014

मेहनत और किस्मत



 रात से जबर्दस्त बारिश से पूरी गाड़ी मे बाढ़ आई थी। आज मैं लखनऊ से सुबह कृषक एक्सप्रेस से वापस गोरखपुर आ रहा था। लोग स्टेशन पर उतारने को बड़े आतुर थे, पर बारिश की वजह से कोई ये जहमत उठा नहीं पा रहा था। पर ट्रेन खुलने का समय हो आया लोग किसी तरह उतरे।

स्टेशन की फ़र्स्ट क्लास गेट से जैसे ही मैंने बाहर कदम रखा तो देख एक निहायत ही गरीब ऑटो वाला। गोरखनाथ, बरगदवा गोरखनाथ, बरगदवा चिल्ला रहा था। उसे कुछ नहीं दिख रहा था ना बारिश, ना अगल-बगल के पकौड़े-समोसे कुछ भी नहीं। उसे तो बस 12 लोग चाहिए थे ताकि उन्हे पहुंचा कर वो एक नई सुबह की ओर कदम बढ़ाए।

मैं और एक महोदया ऑटो मे पहुंचे काफी देर तक हम ऑटो मे से ही देख रहे थे। वो लगातार अपनी सवारी की जुगत मे बड़ी तेज़ बारिश मे लगातार भीग रहा था। पंद्रह मिनट बीते बीस मिनट बीते कुछ कुछ लोग करके आखिर टेम्पो फुल्ल हो गया। उसके चेहरे पर मानो चमक आ गयी थी। 

हमने उससे ये बात कही, "का हो भैया!! एतना तेज़ पानी मे तू भीगत बाड़ा अगर बीमार पड़ गैला त का होई"
ऑटो वाले का चेहरा मानो मुझे देखता ही रह गया। उसे लगा इस समाज मे उसका हाल खबर तो कभी ईश्वर भी नहीं लेते आखिर ये कौन है। 

आज वो सारी बातें मुझे बताने को तैयार था। उसने चाभी लगा दी ऑटो जैसे जैसे आगे बढ़ रही थी, वैसे वैसे वो अपनी पोटली मे रखे सारे गम मुझे सुनकर उसे खाली करने की जुगत मे था।
उसने बोला बबुआ, "हमार एक गो लइकिनी!! बाबा क अस्पताल मे भर्ती बा अगर हम साँझ तक ओहके खातिर 500-600 क जुगत नाही कर पाइब त दवाई क खर्चा कैसे चली??"

अभी वो कुछ आगे बोल पाता कि उसका टेम्पो का पिछला चक्का ज़ोर की आवाज़ कर फट गया।
आज उसकी किस्मत मे पैसा कमाना था ही नहीं। पर मेहनत तो उसने भरपूर की। सारी सवारी सामने की एक ऑटो, जो लगता था भगवान की खुद की बनाई भेजी दी उसमे बैठ गयी। किस्मत से उसके पास सारी सवारी आ गई। 

मैंने कहाँ की क्या मैं आपके साथ चलूँ मदद कर दूँ??
पर उन्होने कहा!! अरे बाबू तू जा हमारे साथ ई हमेशा हौएला। 

मैं समझ नहीं पा रहा था। उन्हे पैसा दूँ 100-200 की ना दूँ। दूँ तो कहीं बुरा ना मान जाए और ना दूँ तो मेरे मन ना माने। फिर सामने शनि देव की मंदिर के पास कुछ देर खड़ा रहा। जाने क्या-क्या अनाब-सनाब बोला था मैं ऊपर वाले को।

आखिर मेहनती को हर बार किस्मती से पीछे क्यूँ कर देते हो???

- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)