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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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बुधवार, 2 अप्रैल 2014

ज़िंदगी की लज़ीज़ डिश


दो चम्मच बारीक 
कटी हुई मुस्कुराहट मे,
हल्की सी मद्धिम आंच पर
कुछ दो चार दाने यादों के छिड़क ।

अंश्कों के तेल मे
छौका लगा उम्मीदों का...
बस कुछ देर ठहरने तो दे,
वादों के कलछुल को
अपनों से गले मिलने 
तो दे ।

अब ढाँप के रख,
धैर्य के बड़े प्लेट से,
ताकि निकल ना जाये
कुछ एहसास धुआँ बन के ।

सारे मौजूद रहेंगे,
तभी तो बनेगी
ज़िंदगी की लज़ीज़ डिश* ।

(डिश* Dish)

©खामोशियाँ-२०१४
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