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अपनी खामोशियाँ खोजे

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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

पतझड़ के पत्ते


आज बसंत था...लोग उसको अपने कंधे पर बिठाए घूम रहे थे पर...किसी ने नहीं देखा उन सूखे पत्तो को...जीवन की आखिरी बात जो रहे थे...आज मन नहीं हो रहा था लिखने का...या सच कहूँ तो कुछ सूझ नहीं रहा था...तभी मैं गुजर रहा था और सुना कराह रहे उन पत्तो की चुर्र चुर्र...!!!

बिछा हूँ जमीन पर...
लोग चढ़े जा रहे...!!!

कराह से मेरी व्याकुल..
पक्षी भागे जा रहे...!!!

कौन उठाये मुझे...
इतनी फुर्सत हैं किसे...!!!

हड्डियाँ तोड़ के...
मुझे कोने जला रहे...!!!

सुबह नए बच्चे लिए...
पेड़ खिल खिलाएंगे...!!!

पर उनको भी तो इश्वर...
वही दिन दिखलाएँगे...!!!
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2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही अच्छे प्रतीक का प्रयोग किया सार्थक रचना

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