गुंजन


गुंजन करती है हर साँझ ख्यालों की ओट में,
तैरता हूँ मैं भी डूबकर छोटे यादों की बोट में।

चुनचुन कर कीमती लम्हे पुराने लिफाफे से,
छापता जाता हूँ हर रोज कागज की नोट में।

©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल

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