बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

१० पैसे की दुआएँ - लघु कथा

काफी पहले की बात है काफी छोटा था मैं। सुबह अभी-अभी जागी थी। चारो तरफ लोग मधुर बेला का मज़ा ले रहे थे। लोग व्यस्त थे अपने में ही। मैं अभी चाय की प्याली लेकर पहली चुस्की लेने को तैयार था कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने उठकर दरवाजा खोला। देखा फटे चिथड़े से लिपटी एक वृद्धा खड़ी थी। आंखो में उसकी सारी परेशानियाँ देखी जा सकती थी। मैं उन्हे थोड़ी देर तक देखता ही रह गया। फिर उनके कटोरे पर नज़र गयी। उसमे सिर्फ १० पैसे पड़े थे। मेरा घर मुहल्ले में काफी घरों बाद में पड़ता है। मैं यही सोचने लगा कि क्या आज दुनिया इतनी एडवांस हो चुकी हैं कि नई मूवी देखने में वो बालकनी लेते डीसी नहीं, आइसक्रीम नए फ्लेवर की ही खाते भले उसमे ५०-६० रुपए अधिक गवाने पड़े। लेकिन वृद्धा के कटोरे को देख कर लगा कि मुहल्ले वाले तो सारे गरीब हैं।

मैं अंदर गया और अम्मा से बोला। बाहर देखिये कोई आया है उन्हे कुछ दे दीजिये। अम्मा ने १० रूपए दिये। मैं सोचा इन दस रुपए से आखिर उनका क्या होगा। अम्मा मेरी हालत समझ चुकी थी। उसने तुरंत १० रुपए मे दो शून्य और जोड़ दिये। मैं भी खुशी खुशी उन्हे देने को गया मुझे लगा आज आशीर्वाद मिलेगा बहुत ज्यादा। आखिर इंसान को और क्या चाहिए आशीर्वाद ही तो ताकि वो आगे बढ़ सके, नाम कमा सके। यही सब सोचते मैं वृद्धा के समीप आ गया।

मैंने बोला, "दादी ये लीजिये १००० रुपए। इससे कुछ दिन तो आप आराम से गुज़ार सकेंगी।"
वृद्धा ने जवाब दिया, "मैंने आज तक भीख नहीं मांगा बेटा, इसलिए मुझे इसे लेने में लज्जा आ रही। आज अगर मेरा बेटा जिंदा होता तो वो मुझे इस हाल में नहीं छोड़ता।"
मैं बड़े पेसोपेस में फंस गया। छोटा सा तो था मैं इतनी सब बातें मेरे भेजे की परिधि से बाहर की थी।

फिर भी मैंने प्रयास किया,"दादी मेरे पास एक उपाए है।"
उन्होने से आश्चर्य से पूछा,"क्या"
मैं जवाब दिया,"दादी आप मुझे अपना १० पैसा दे दीजिये और मैं आपको ये दे दूंगा। दोनों पैसे ही तो है इंसान के द्वारा बनाए। आखिर दोनों में फर्क क्या केवल दो शून्य का। वैसे भी शून्य का कोई वजूद नहीं होता।"

वृद्धा समझ गयी थी कि आज बच्चा उन्हे वो दे कर रहेगा। थोड़ी देर तक उन्होने सोचा फिर मुझे गले लगा लिया।

आँसू रुक नहीं रहे थे। झरते ही जा रहे थे। आज जब भी मैं वो १० पैसे देखता हूँ तो सोचता आखिर ये उनके दस पैसे ही तो थे जिसने मुझे आज इतना समजदार बना दिया कि मैं दुनिया को परख सकूँ /समझ सकूँ ।

तो दुआ ही तो थी दादी की बस १० पैसे की दुवा।
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१० पैसे की दुआएँ - लघु कथा
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(३१-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

बुधवार, 30 जुलाई 2014

सूनी वादियाँ - Maestro Productions



सूनी वादियों से कोई पत्ता टूटा है,
वो अपना बिन बताए ही रूठा है।

लोरी सुनाने पर कैसे मान जाए,
वो बच्चा भी रात भर का भूखा है।

बिन पिए अब होश में रहता कहाँ,
वो साकी ऐसा मैखानो से रूठा है।

मुसाफ़िर बदलते रहे नक्शे अपने,
वो रास्ता भी आगे बीच से टूटा है।

रात फ़लक से शिकायत कौन करे,
कोने का तारा अकेले क्यू रूठा है।

©खामोशियाँ-२०१४/मिश्रा राहुल
(३०-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नों से)

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

Rule Book - An Overload


सख्त नियम/जटिल कायदे/उलझा इंसान।
कायदे कानून में बंधा चेहरा। किताबी बातों से लदा इंसान।

हमने थोपे है अपने कायदे दूसरों पर। कुछ ऐसे बंधन जिसकी कभी जरूरत नहीं थी। जिंदगी को गुरुकुल जैसे जिया है हमने। कुछ किताबी आदर्श/कुछ व्यवहारिक परम्पराओं को ढोते आए हैं। ऐसा नहीं है सब अनर्गल था, पर इसकी वजह से मेरी जो छवि है वो कड़क शासक के रूप में बन गयी हैं। या कभी-कभी तो लोग घमंडी तक की संज्ञा दे जाते।

हाँ। हमने अपनी रूल बुक के हर पन्ने को साकार करने की कोशिश की हैं। कामयाब हुआ हूँ की नहीं ये तो शर्वशक्तिमान महाकाल ही बता पाएंगे।

अब इस छवि को बदलने का समय आ गया।
हाँ हे ईश्वर !! मुखौटे नहीं लगाए है हमने कभी भी। वही किया जो वक़्त की अदायगी थी। लेकिन अब और इस किताब को ढोना मुमकिन नहीं। काफी भारी हो चुकी है ये पन्ने जुडते गए हैं इसमे। मायने/एहसास/विचार/कायदे सब एक दूसरे से लड़ रहे। किन्ही दो मजहब के इंसान के जैसे।

Rule Book - An Overload
©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(३०-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो पे)

इंसान


इंसान जलती
भट्टी होता।

लोग सेंकते
अपनी रोटी,
बारी बारी से।

कभी किसी की
रोटी जलती,
तो कभी
किसी का हाथ।

फिर भी बड़े
प्रेम से खिलाता,
दिन का निवाला।

खाकर फिर
प्यार से देखते,
रोती  भट्टी
राख़ रहती तबतक।

©खामोशियाँ-२०१४ // मिश्रा राहुल
(३०-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

सोमवार, 28 जुलाई 2014

इंसानियत


वो कटते है वो मरते हैं,
बातें अदब की करते हैं।

मंदिर-मस्जिद आगे करके,
चर्चे साहब सी करते हैं।

घंटे-अज़ान की राग बताके,
दंगे मजहब की करते हैं।

मिलता है क्या इनसे इनको,
रातें बेढब सी करते हैं।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२८-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

आपका वजूद


अनर्गल बातों मे घुसना छोड़िए,
चलती चक्की में पिसना छोड़िए।

आपका वजूद आपकी सादगी है,
नए सलीकों में फंसना छोड़िए।

गलती हो गयी तो मान लीजिये,
बेवजह दूसरों को कोसना छोड़िए।

जरा आराम से काटिए सुबह-शाम
रोज़ रोज़ जिंदगी को घिसना छोड़िए।

किस्मत लकीरों की मोहताज नहीं
उसी को पकड़ के सोचना छोड़िए।
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©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२५-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

डायरी


कभी कभी
भूल जाता,
पन्ने लिखना
डायरी के।

दिन हर रोज़
एक सा ही तो रहता।
सुबह के अखबार से,
रात की खामोशी तक।

आखिर,
कॉपी-पेस्ट ही
तो करते है हम।

आस की लाईमलाइट
मे आज भी चलती है,
सपनों की रील।

आजकल,
रिवाइंड बटन
काम नहीं करता।
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©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२२-जुलाई-२०१४)(डायरी के पन्नो से)