बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

शनिवार, 7 जून 2014

ज़िंदगी जरूरी है



सुलझी ही रहती तो ज़िंदगी कैसे होती...
उलझी ही रहती तो बंदगी कैसे होती....!!! 


नाम हथेली मे छुपाए घूमते रहती...
बहकी ही रहती तो सादगी कैसे होती....!!!

चर्चे फैलते जा रहे हर-तरफ मुहल्लों मे...
हलकी ही रहती तो पेशगी कैसे होती....!!!

पसंद तो करते ही हैं तुझे सारे चेहरे....
चुटकी ही रहती तो बानगी कैसे होती...!!!


Poetry & Narration- Misra RaahuL..
Casts- Md. Israr (मोहम्मद इसरार)........VishaaL Mishra (विशाल मिश्रा)
Misra RaahuL (मिश्रा राहुल).........Vikash Shrivastava (विकाश श्रीवास्तव)

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल

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