भोर के तारे,सांझ का आलस,रात का सूरज,पतझड़ के भौरे.... ताकते हैं हमेशा एक अजीब बातें जो लोग कहते हो नहीं सकता... चलते राहों पर मंजिल पाने को पैदल चल रहे कदमो में लिपटे धूल की परत... एक अनजाने की तरह उसे धुलने चल दिए...कितनी कशिश थी उस धूल की हमसे लिपटने की...कैसे समझाए वो...मौसम भी बदनुमा था शायद या थोड़ा बेवफा जैसा...एक जाल में था फंसा हर आदमी जाने क्यूँ पता नहीं क्यूँ समझ नहीं पाता इतना सा हकीकत...एक तिनका हैं वो और कुछ भी नहीं...कुछ करना न करना में उसे हवाओं का साथ जरूरी हैं..
रविवार, 28 अप्रैल 2013
शनिवार, 27 अप्रैल 2013
छांव की शर्बत...
गुल तो मेरे
आगन मे
भी पड़े हैं...!!
लूह के
चाटे खाये
लाल गाल लिए...!!
तोड़ दूँ
तो मर जाये...
छोड़ दूँ
तो मर जाये...!!
दिन भर
गमला थामे..
दौड़ता रहता
इधर-उधर...!!
छांव की
शर्बत पिलाते...!!
अब कहाँ
मिल पाती
नींबू पानी शर्बत...
~खामोशियाँ©
शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013
फूटबाल
हर रोज़....
साहिल पर बैठे.......
कभी गुलमोहर की ओट लिए...
शब खेल रही आँख-मिचौली...
और पकड़ गया गोला...
अब जाना होगा तुझे....
कल फिर आना...!!
~खामोशियाँ©
साहिल पर बैठे.......
निहारता
एक गोल मटोल....
एक गोल मटोल....
फूटबाल...
गिरता जाता
गिरता जाता
मटमैले पाले मे...!!
कभी गुलमोहर की ओट लिए...
झाँकता आखें छुपाए...!!
शब खेल रही आँख-मिचौली...
और पकड़ गया गोला...
अब जाना होगा तुझे....
कल फिर आना...!!
~खामोशियाँ©
रविवार, 21 अप्रैल 2013
दुपहरी:
दुपहरी वक़्त सेंकती
धरा तपता तावा लिए...!!
लूह के थपेड़े जला रहे
बार-बार बुझती अगीठी...!!
साँझ रोज़ चाली आती
थामे रंग बिरंगे आइस-क्रीम ...!!
आज भी याद वो पश्मीना
शाल ओढे दरवाजा...
काट लिया पूरी सर्दी...!!
पसीने छूट रहे उसके...
शीशम रो रहा शायद...!!
खीच के देख ले करकराहट
जमी हैं उसकी सिसकियों मे...!!
~खामोशियाँ©
रविवार, 14 अप्रैल 2013
उलझे मंझे
जिंदगी कभी ऐसी गूँज भी सुनाती हैं,
बशर को शायरों के चौबारे पहुंचाती हैं...!!!
कोई मोती लादे नयनो में झाँके तो,
कितने किस्से झलकियाँ दिखलाती हैं...!!
कभी बुलाती वो पीले पत्र ओढ़े,
तो कभी जेबों से सूखे नज्म खुलवाती हैं...!!
रात कुरेदता पुराने जख्मो को लिए,
सुबह बासी यादों के पुलाव सनवाती हैं...!!
देखते उड़कर कटे लुढ़कते उन पतंगों को,
ज़िन्दगी भी जाने कितने मंझे कटवाती हैं...!!
~खामोशियाँ©
शनिवार, 13 अप्रैल 2013
शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013
एक शाम चुरा लूँ...
बड़ा दूर चला आया हूँ...इस मझी हुई ज़िंदगी मे...कुछ लम्हे नोच कर बटुए मे रख लू...!!
एक शाम को ढलता सूरज...उसपे डोरे डालते लफंगे अब्र....क्या मनोहर दृश्य रहता...पर फुर्सत नहीं हमे की देख सके उनकी अठकेलियाँ...!!
बस चाहता हूँ...
वक़्त की डायरी से
चुरा लूँ एक शाम...!!
यादों की भींड से
बुला लूँ एक नाम...!!
वादो की ढ़ेबरी मे
माना लू एक जाम...!!
साजो की गगरी से
सजा लू एक पैगाम...!!
बस चाहता हूँ...
वक़्त की डायरी से
चुरा लूँ एक शाम...!!
यादों की भींड से
बुला लूँ एक नाम...!!
वादो की ढ़ेबरी मे
माना लू एक जाम...!!
साजो की गगरी से
सजा लू एक पैगाम...!!
बस चाहता हूँ...
~खामोशियाँ©
मंगलवार, 9 अप्रैल 2013
फेसबुक स्पेशल:
लोग ऐसे अपडेट की कामना हमसे तो कतई नहीं करते पर फिर भी आज हम कुछ नया ही परोस देते हैं...!!
दिन उगते ही फेसबुक पर कूदता हैं...
अपने अपडेटों पर कमेंट ढूँढता हैं...!!
कोई टैग ना करे ऐसा विचार रख...
खुद दुनिया भर के टैग परोसता हैं...!!
कितने झगड़े कितनी खिच पिच...
सारे दांव पेच यही पे खोजता हैं...!!
कितनी दिक्कतों मे रहती जिंदगी...
इंसान फेसबुक खोलना ना भूलता हैं...!!
क्या चीज बना डाली ए "मार्क" तूने
इंसान रोज नयी फोटो खीचता फिरता हैं...!!
~खामोशियाँ©
शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013
गुरुवार, 4 अप्रैल 2013
बुधवार, 3 अप्रैल 2013
पीटी लाइन...
एक
कड़कती धूप मे
कतार लगाए कितने खंभे...!!
सभी
के बंधे हैं सिरहाने
दोनों हाथ ऊपर ताने खड़े...!!
ओह
पीटी लाइन लगी
शनिवार ही रहता यहाँ रोज...!!
~खामोशियाँ©
मंगलवार, 2 अप्रैल 2013
गमो का जन्मदिन...
एक खाली
पड़े मकान से
जाने कितनी बार बात हुई...
कई रात
दोनों साथ काटें
सिरहाने तक लगवाए साथ...
रात मे
दियासलाई मार के
कितने अँधेरों को भगाए साथ...
देख आगन
पर कैसे टॉर्च
मार दोनों की तलाशी ले रहा अब्र...
बयार भी
दरवाजे पर कुंडी
पकड़ झूलती नजर आ रही...
सम्मे चिपके
कान लगाए चाह
रहे सुनना हम लोगों की फूस-फूस...
अब खोल
भी दे देख दरीचों
तलक आ पहुचे जुगनू रोते रोते...
देख अब
कहा तू अकेला
सब तो हैं चल आज माना ही ले...
... गमो का जन्मदिन...
सोमवार, 1 अप्रैल 2013
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