बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

गुरुवार, 22 मई 2014

उलझी बातें


देखकर कैसे अब नजरें फेरता है,
इंसान भी यहाँ शैतानों से खेलता है।

सोच से परे होते हैं कुछ चेहरे देख,
सोने का भाव पैमानों से तौलता है।

कितनी उलझी है बातें आजकल की,
सीधे सा जवाब सवालों में बोलता है।

दोस्ती-दुश्मनी मे भी फासला कैसा,
जहर की मिस्री ख्यालों में घोलता है।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल

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