बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

रविवार, 22 दिसंबर 2013

एहसासों के "जनरल डायर".



हमे गुस्सा है उन लेखकों से जो अपने एहसासों की लहरें बस डायरी के सफ़ेद पन्नो मे उड़ेल कर अपने मेज़ के कोने मे झटक देते.....!!!

एहसास का भी उसमे पड़े पड़े दम घुटता जाता और वो मर जाते....सिमट जाते किसी कबोर्ड की धूल भरी आलमारी ताकते.....!!!
अगर आपके पास कुछ हैं वो उसे बाहर आने दे.....ब्लॉग को जरिया बनाए....
****************************************************

But Please Don't Strangle your emotions which are with you....Make them to burst a Fountain of Bliss to Bath everyone.....!!!
****************************************************
कल देखा....
एक धूल भरी....
टूटी फूटी आलमारी मे दुबके....
एक पुरानी डायरी मे....
कुछ मरे पड़े थे अलफाज.....!!!


काफी दिन हो गए.....
मिल ना पाया था उनसे....
कुछ बुकमार्क
पकड़ निकाल लिए.....!!!


पर बाकी एहसास
मानो जालियावाला बाग मे फंसे....
एक दूजे के ऊपर....
गिरे पड़े ...!!!


कुछ के सर
दूसरे के हाथो मे लटके मिले.....!!!


कुछ की टाँगो को
अफगानी बम से उड़ा डाले....
आखिर क्यूँ बन जाते हैं आप खुद
अपने एहसासों के "जनरल डायर"....???


©खामोशियाँ-२०१३

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (23-12-13) को "प्राकृतिक उद्देश्य...खामोश गुजारिश" (चर्चा मंच : अंक - 1470) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    जवाब देंहटाएं
  2. एहसास तो जीने के लिए ही होते हैं... जिए ही जाने चाहिए...!
    बना रहे एहसास... बना रहेगा जीवन!

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत खूब...अपने अहसासों को सुबह की धूप भी दिखाएँ और रात की चाँदनी भी...

    जवाब देंहटाएं
  4. सच कह है ... गुनगुनी सर्दी की धूप उन्हें ताज़ा कर देगी .. एहसास जाग उठेंगे ... और बन जायगी रचना ...

    जवाब देंहटाएं
  5. एहसास मर जायेगा तो इन्सान कहाँ रहेगा ,वह तो कोई और जीव होगा !
    नई पोस्ट चाँदनी रात
    नई पोस्ट मेरे सपनों का रामराज्य ( भाग २ )

    जवाब देंहटाएं
  6. मर्मस्पर्शी ....
    यथार्थपरक कविता ......

    जवाब देंहटाएं
  7. achha lagaa .. aksar puraani diaries almari mein hi padi hoti hain. unme likhe shabdon ke baare mein is angle se socha nahi kabhi.

    जवाब देंहटाएं