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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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रविवार, 9 जून 2013

यून्ही...!!!


वक़्त की...
...सरगोशियो मे कहीं

मधिम आंच पर...
...पक रही थी दाल

जो एकाएक...
...आज सीटी मार कर
बाहर निकल गयी...!!!

©खामोशियाँ
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5 टिप्‍पणियां:

  1. आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज (सोमवार, १० जून, २०१३) के ब्लॉग बुलेटिन - दूरदर्शी पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

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  2. तुषार भाई आप यहाँ पधारे यही काफी हैं....!!!

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  3. बहुत सुन्दर.बहुत बढ़िया लिखा है .शुभकामनायें आपको .

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  4. वाह !! एक अलग अंदाज़ कि रचना ......बहुत खूब

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