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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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शुक्रवार, 28 जून 2013

बेरोजगार


बेरोजगार
रोज़ भाव ढूंढता रहता...
बड़ी आस से किवाड़ खोलता...
कहीं कुछ मिले दांव उठाने को...!!

नज़्म की खोल से ऊपर तक..
यादें वादे मुंह छुपाती...!!

सुना हैं बारीक होते बटखरे...
चलो तोड़ तोड़ बेंच दूंगा...!!

सारे 24 कैरेट खरे
चमकते नींद के गोले...!!

अब इनसे बनती नहीं नींद की....!!

©खामोशियाँ
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2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर और प्रभावी अभिव्यक्ति...

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  2. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

    उत्तर देंहटाएं