बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

शायर...!!!

किसी जलते शहर में कभी से बैठा था शायर,
गजलों को पुडिया बनाकर फेका था बहार...
किसी ने गिरते लफ्जों को इस कदर संजो लिया था,
मानो उड़ते धुएं तलक चेहरा ढाप रहा था शायद...
कितने आईने बदन पर धंसाए बैठा वो,
फिरभी खुद में खुद ढूढने में नाकाम रहा था शायर...!!

बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

एक ही ख्वाब...!!!


नजरें बंद होते ही बस एक ही ख्वाब से मैं परेशान हो गया हूँ...जैसे किसी तकनिकी को समझाने लिए प्रमेय की आवश्यकता होती....शायद उसी तरह किसी भावनाओं को व्यक्त करने खातिर पुराने बुद्धिजीवियों ने कविताएँ का निर्माण किया...मैं इस कथन से कतई सहमत नहीं की "मुझे शायरी आती नहीं...मुझे कविताएँ में रूचि नहीं...इनमे रची न रखने वालों ने फिर असल मायनों में जिंदगी जी ही नहीं...चलिए ख्वाब से रु-बा-रु तो करा दु अपने...!!!
एक ही ख्वाब...!!!
एक ही ख्वाब चला आता बेवक्त धूल मिट्टी से लिपटा हुआ...
शोर के मुरझाये गुल बालों में खोसे बहक के चलता हुआ...!!!
साँसे फूल रही उसकी आखों तक पहुँचते पहुँचते
भागता दौड़ता आखों में चिपका दीवारों से टकराता हुआ...!!!
दिखा यूँ की चली आई "आकृति" बलखाते हुए...
कमर में उरस कर चाबी की गुच्छी झनकाते हुए...!!!
एक खुशी अपनी बालों में लगा के घुमती देख...
पहुच गयी चेहरे तलक बालों का रस टपकाते हुए...!!!
रूठी तो लेट गयी फर्श पर मुह फुलाए...
तो कभी फर्श से मुझे गोद में बिठाती बहालाते फ़ुस्लाते हुए ...!!!

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

चाँद थाल में...!!!


कभी था पर कभी उसे ना पता हैं,
छोटी छोटी बातों में क्यूँ मद खपाता हैं...!!

एक सांझ रोज आती घूँघट काढ़े,
क्यूँ ना तू उसे अपने लिए मनाता हैं..!!!

देख रोज चाँद भटक आता यहाँ पर,
क्यूँ ना तू उस रौशनी में नहाता हैं...!!!

जिंदगी तो ठहरी मजदूर जन्नुम की,
क्यूँ ना तू कटोरे में रोटी प्याज सजाता हैं...!!

बूढी इमली पीछे दुधिया टोर्च थामे रखता,
दिन ठीक हैं वरना यह चाँद भी लडखडाता हैं...!!!

तडपती मछलियाँ....



उनकी दूरियों से भली तो नजदीकियां थी,
कितने बादलों से लिपटी उनकी बस्तियां थी...!!!

बस चले जा रहे यूँही कही घूमते हुए,
गर्दिशों से बड़ी तो जिल्लतों की कस्तियाँ थी...!!!

एक अजब सी बिजली को झेल रहा था,
यूँ निकलती आइनों से उभरी "आकृतियाँ" थी...!!!

जाने कितने लाशों को लादे चल रहा था मैं,

पहुंचा जब तालाब तलक तो देखा ए दोस्त,
गठरी में मरती तड़पती मछलियाँ थी...!!!

अलसाई सी धूप...!!!


एक बड़ी अलसाई सी धूप
बालों को सहला रही ...!!!

अजीब रंगत थामे वो
जुल्फों में उलझा रही ..!!!

दिन भर
पसीने से तर बतर देख.

अपने बाजुओ में
जाने कितने रंग गुदवा रही ..!!!

एक अजीब रात...!!!


आज यह रात भी आ गयी ... !!!

जैसे हो किसी घने बगीचे के...

पेडो कि ओट लिए छुपते छुपते...!!!

लगता हैं बादल की जेब से..

चाँद की चमकती अठन्नी चुराई हैं..!!!

वही फटी पुरानी काली शाल लपेटे...

चल पड़ी हैं मेले में गुम होने को...!!!

अब यह सन्नाटे इसकी...

आखों में धूल जैसे चुभ रहे...!!!

कोई बुला तो दे उन झीगुरों के..
टोलियों को कहा गायब हो गए...!!

एहसास:..!!

हर बार कभी अकेले बैठे नजर हर कोनों को अपनी ओर आकर्षित करती...!!!
या कहे किसी वातानुकूलित कैप्सूल में बैठे ढके हो कितने रंगीनियों से...!!!
पर दर्द से कराह रही नसों में कौन जान फूंके...!!!
आखें तड़प रही जिसके पूनम के चाँद की उसे कौन झील में परोसे...!!!
बस बयार को समझा दे कोई की उसके अक्स को तंग न करे...!!!
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