बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

शुक्रवार, 26 मई 2017

सुपर कमांडो ध्रुव

गर्मी की छुटियाँ शुरू हो चुकी हैं। छुट्टियां बिना कॉमिक्स के हमारे जमाने मे कैसी होती थी। ये कोई नब्बे के दशक के बच्चों से पूछ लें।

किराए पर कॉमिक्स लाकर पढ़ने का मज़ा ही अलग होता था। क्योंकि उस समय जेबों में इतने पैसे नही होते थे की पूरी 30 रुपए की कॉमिक्स खरीदी जा सके। नानी मामा के यहां से चंदा जुटने के बाद भी 3-4 कॉमिक्स में ही ढेर हो जाया करते थे। पड़ोस में रमेश काका की स्टेशनरी की दुकान से कितनी कॉमिक्स किराए पर लाई थी याद भी नही। उसमे कितने हमने झटक के अपने आलमारी में रख ली वो उनको भी याद नही। खैर आजकल सेलफोन पर चमकी स्क्रीन के गेम ने कॉमिक्स की जगह ले ली है फिर भी एक गुजारिश है राज कॉमिक्स से।

अनुपम सिन्हा वापस ले आइये हमारे करैक्टर ध्रुव को। शक्तिशाली, बुद्धिबल से पल भर में दुश्मनों को मटियामेट करने वाला ध्रुव के पास खास ऐसी कोई शक्तियां नहीं थी। पर स्टार बेल्ट, और अपनी सुपर कमांडों वाली छवि से हमारे बचपन का हीरो खुद को बड़े बड़े नामों से आगे पाता था। आसपास की चीजों को हथियार बनाकर ध्रुव किसी भी परिस्थिति में खुद को ढाल ले जाता था।

नागराज, तिरंगा, डोगा, परमाणु जैसे दोस्तोँ के होते हुए भी ध्रुव की छवि बेहद ही शानादार ढंग से प्रस्तुत किया था अनुपम सिन्हा जी।

- मिश्रा राहुल | २५ - मई - २०१७
(ब्लॉगिस्ट एवं लेखक)

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