बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

बुधवार, 3 मई 2017

बाहुबली

हर
रोज तो
मरता है
बाहुबली।

कितने
कटप्पा
खंजर करते
भरोसे का।

कितने
भल्ला
फायदा उठाते
दूरियों का।

हर
रोज तो
मरता है
बाहुबली।

- राहुल

सोमवार, 1 मई 2017

मैं हूँ

मैं हूँ
खुद में कहीं,
खोया हूँ
खुद में कहीं।

बदलकर
भी देखा,
बहलकर
भी देखा।

खोजता हूँ
खुद को वहीं,
जहां छोड़ा था
तुझ को वहीं।

मैं में
मैं हूँ,
कि नहीं।
तुझ में
मैं हूँ
कि नहीं।

जानता
हूँ ऐसा,
ना जानकर
हूँ ऐसा।

चाहता हूँ
रहूं मैं खुद में।
खोज रहा हूँ
खुद को
खुद में ही कहीं।

- मिश्रा राहुल
(1-मई-2017)

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

सामना

जब सामना होगा तो बात भी हो जाएगी,
पुरानी अटकी हुई वो रात भी हो जाएगी।

जवाब खोजेंगे दो लफ्ज़ अपने तरीके से,
बदले चेहरों से मुलाक़ात भी हो जाएगी।

कब तक रखोगे रद्दी अपने नज़्मों की
जब चिंगारी बढ़ेगी तो राख भी हो जाएगी।

कितनी झुर्रियां लद चुकी हैं पालते पालते,
आईने खुद बोलेंगे तो हिसाब भी हो जाएगी।

अगले चौराहे से बदलेंगे कारवां-ए-ज़िंदगी,
चाँद लेकर चलेंगे तो आदाब भी हो जाएगी।

©खामोशियाँ | 21- अप्रैल-2017
(मिश्रा राहुल) (डायरी के पन्नो से)

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

दोस्त

रानीसार, बीकानेर से करीब सौ किलोमीटर पश्चिम की तरफ पाकिस्तान सीमा पर बसा एक छोटा सा गाँव। जहां गर्मी मे तापमान करीब 45 डिग्री रहता तो ठंड मे दुबुक कर 5 डिग्री तक चला जाता। सीमा पर होने की वजह से यह क्षेत्र कुछ ज्यादा ही संवेदनशील था।

अनिल अग्रवाल अपने छोटे से परिवार के साथ यही रहा करते थे। उनके परिवार मे अनिल बाबू उनकी बीबी और हीरो था। अनिल बाबू का कोई बच्चा नहीं था, वो हीरो पर ही अपनी जान छिटकते थे।

हीरो...उनका प्यारा सा ऊंट। अनिल बाबू की दुकान भी थी पास के क्षेत्र मे, बहुत बड़ी तो नहीं पर इतनी थी की उनका गुजर बसर हो जाता था। दुकान का नाम भी अनिल बाबू “हीरो मिष्ठान भंडार” ही रखे थे। उनके और हीरो के चर्चे पूरे गाँव मे छाए रहते थे। मजाल है कोई उनके दुकान मे आ जाए और बिना हीरो की सलामती पूछे चला जाए। अनिल बाबू गुस्सा हो जाते थे।

हीरो भी तो उन्हे काफी प्यार करता था। जब भी वो पास आते तो अपनी बड़ी सी गर्दन नीचे झुकाए कानो मे कुछ फुसफुसाता था। जो केवल अनिल बाबू ही समझते थे शायद।

अनिल अग्रवाल पेशे से हलवाई नहीं थे, पर श्रीमती के दूर ना जाने की हठ के वजह से उन्होने अपना मनपसंद काम छोड़ दिया था। हाँ मनपसंद काम, वो एक गाइड थे। जूनागढ़ का किला, लक्ष्मी निवास महल, लालगढ़ महल कभी उनके जुबान से चिपके रहते थे। अब तक तो सब भूल गए, पर हाँ यादें हैं अभी भी उनके पास ताज़ी बची। कैसे उन्होने हीरो को पाया था, कैसे उनके बीच दोस्ती बढ़ी थी।

फिर भी अनिल बाबू खुश थे। उनका कारोबार अच्छा चल रहा था हर दिन जैसे। आज सुबह सुबह उनको फोन आया दुकान का समान खत्म हो गया है। अनिल बाबू अक्सर शहर जाकर समान खरीद के लाते थे। इसी बहाने वो और हीरो घूम के भी आते थे। खाना बंध गया और सब निकलने वाले थे कि कुछ अनहोनी की आशंका ने माया अग्रवाल के चेहरे को ढाँप लिया। वो माना करने लगी ऐसा वो हमेशा तो नहीं करती थी। पर हीरो और अनिल बाबू कहाँ मानने वाले थे। आखिर महीने मे एक बारगी शहर जो घूमने को मिलता। दोनों निकल ही पड़े।

अभी कुछ पाँच मील ही चले होंगे की अचानक एक रेतीले तूफान उनके रास्ते मे अवरोध बनके खड़ा हो गया। तूफान इतना तगड़ा था कि अब तो अनिल बाबू को बस माया की कही हर बात सच जमाने लगी थी। अब तो तूफान और दहाड़ने लगा था आगे जाना मुमकिन नहीं था और हारकर हीरो-अनिल वापस लौटने की कोशिश करने लगे। करीब 15 मिनट बाद तूफान कुछ थमा। लौटते वक़्त अनिल के मन मे सैंकड़ों खयाल जन्म ले लेकर मर रहे थे। उन्हे आते-आते करीब डेढ़ घंटे लग गए। वो सोचते सोचते घर आ गए पर घर तो कहीं था नहीं, ना ही उनकी दुकान। माया को भी बहुत ढूँढे पर मिली नहीं।

थक हार कर बैठे अनिल बाबू को रामदरश मिस्त्री ने बताया भैया भौजी को काफी चोट लग गयी है पास के अस्पताल मे भर्ती है आप तुरंत पहुंचिए। आनन-फानन मे अनिल बाबू-हीरो जल्दी से वहाँ पहुंचे तो पता चला कि माया के सर मे गंभीर चोट आई है ऑपरेशन करना पड़ेगा। अब सर पकड़ बैठे अनिल बाबू की दुकान तो ईश्वर ने लील ली, बीबी बिस्तरा पकड़े बैठी है और बैंक मे इतने पैसे हैं नहीं की इलाज हो। अनिल बाबू को मानो क्या हो गया, बड़े ही सालीन विचारधारा के अनिल अग्रवाल को आजतक हमने इतना परेशान कभी नहीं देखा था। पास खड़े देवेन्द्र चाचा ने कहाँ बेटा अनिल देखो सुनील सिंह राजपूत से मदद लो अब वही कुछ मदद कर सकेंगे। सुनील सिंह उस जगह के साहूकार हुआ करते थे।

अनिल बाबू ने बिना समय गवाए तुरंत उनके यहाँ जाके के अपनी कहानी बतलाई। पर साहूकार कहाँ सुनते किसी की बस यही बोलते रहे कुछ हैं गिरवी रखने को तो बताओ वर्ण अपना समय ना खराब करो। अनिल बाबू के पास था ही क्या जो वो रखते शायाद कुछ नहीं। जाते जाते सुनील ने कहाँ “अनिल एक मशवरा दूँ, तुम्हारे पास एक ऐसी चीज है जिसके बदले मैं तुम्हें अच्छी ख़ासी रकम दे सकता हूँ। जिससे भाभी भी ठीक हो जाएंगी और तुम अपना कारोबार जिला भी सकोगे....ये ऊंट खड़ा है ये हमे दे दो।” इतना सुनते ही अनिल अग्रवाल अपना आपा खो बैठे, जाने क्या अनाब-सनाब बकने लगे सुनील सिंह को। फिर भी सुनील सिंह ने कहाँ अनिल अभी तुम परेशान हो हम तुम्हारी बात का बुरा नहीं माने कल तक बताना। रही बात ऊंट की तो जैसे ही तुम अपने पैसे चुकता करोगे लिए जाना उसे यहाँ से।

अनिल बाबू अब और जटिल धर्मसंकट मे फंस चुके थे। एक तरफ दुकान, दूसरी तरफ बीबी और अब हीरो सब उनको अपने पास से जाते हुए ही दिख रहे थे। अचानक एक रोज़ मे जैसे उनपर पहाड़ सा टूट पड़ा था। उन्होने हीरो को प्यार से पुचकारा। हीरो भी बार बार भाभी की ओर इशारा कर कुछ समझाना चाह रहा था। शायद अनिल बाबू समझ भी रहे थे पर आज उनकी समझ उनके लगाव पर हावी नहीं हो पा रही थी। पर हीरो ने उन्हे माना ही लिया, ठीक उसी तरह गर्दन झुका के कान मे कुछ फुसफुसाया जो केवल अनिल बाबू समझते थे।

भोर हुई और हीरो को लेकर सुनील सिंह के यहाँ पहुँच गए अनिल बाबू। बात पक्की हो गयी। जाते जाते अनिल बाबू ने हीरो के माथे को चूमा और दिलासा दिया बहुत जल्द आने का। आँखें तो नाम थी हीरो की भी और अनिल बाबू की भी पर शायद नियति को दोनों मे से किसी पर भी तरस नहीं आ रहा था।

ऑपरेशन की फीस जमा हुई। भाभी का ऑपरेशन सफल हो गया। अनिल बाबू ने अपनी जी जान लगा कर फिर से कारोबार फिर से उठा लिया। पर अनिल बाबू को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था हीरो के बिना। वो रोज़ कुछ पैसे जूटाकर एक बक्से मे रखते जाते। कलेंडर पर निशान चढ़ते गए और साथ ही बक्सो मे रुपये जमते गए। कुछ यही चार-पाँच महीने बीते और वो दिन आ गया।

अनिल अग्रवाल चेहरे पर चमक और हाथो मे रुपये लिए चल पड़े साहूकार के घर की ओर। मन मे तरह-तरह के विचारो को थामे। बड़े प्रफुल्लित लग रहे थे, आज मालूम हो रहा था अनिल फिर से जी उठे है। पर पहुँचते उन्होने पाया की साहूकार के यहाँ ताला पड़ा है। थोड़ी जांच पड़ताल पर पता चला कि वो लडेरा गए हैं, शायद किसी ऊंट महोत्सव मे। अनिल बाबू इतना सुनते ही भागे भागे पहुंचे वहाँ।

ऊंट महोत्सव इनता भरा-भरा सा था की आदमी पहचान पाना मुश्किल सा हो रहा था। काफी खोज के बाद वो थक से गए। तभी ऊंट प्रतियोगिता की घोषणा ने उनकी तत्परता और बढ़ा दी। काफी-सारे ऊँटो के बीच खड़ा हीरो को देख उनसे रहा ना गया। वो अंदर जाकर उससे मिलने की कोशिश करने लगे। पर किनारे पर लगे तारों और काफी सख्त सुरक्षा ने उन्हे वहाँ जाने से पहले ही रोक दिया।

रेस शुरू हो चुका था। सभी अपने ऊंट लेकर दौड़ रहे थे। हीरो पर सवार चालक उसे बुरी तरह पीट-पीट कर दौड़ाए जा रहे थे। चालक की हर वार से अनिल बाबू का सीना छलनी हो जाता था। रेस खत्म हुआ और हीरो विजयी घोषित हुआ, पर अनिल बाबू की खुशी की वजह उसकी जीत ना थी बल्कि सिर्फ हीरो था। हीरो गले मे विजयी तमगा लिए सुनील सिंह राजपुत के साथ आ रहा था कि अनिल बाबू ने उन्हे रोक लिया। सुनील को शायद इस बात का अंदेशा नहीं था कि वो इतनी जल्दी हीरो को लेने आ जाएगा। फिर भी सुनील ने एक और चाल चली, “अनिल एक बात बोलू तुम मुझसे जीतने चाहे पैसे ले लो पर ये ऊंट हमको दे दो”

अबकी बार अनिल बाबू रुकने वाले नहीं थे। सीधा बोल दिया “आप हमको वो कीमत नहीं दे पाएंगे जिससे एक दोस्त को खरीदा जा सके साहूकार बाबू, हर वस्तु पैसों से नहीं खरीदा जा सकता। “आप अपने पैसे रखिए और हमारा दोस्त हीरो मुझे वापस कर दीजिये। सुनील को अब ऊंट की हैसियत का अंदाज़ा अनिल के जीवन के परिपेक्ष मे हो चुका था। उसने लगाम अनिल को पकड़ा दी और कहा हाँ अनिल तुम्हारा दोस्त सच मे हीरो ही है। अनिल बाबू ने लगाम तुरंत निकाल हीरो से लिपट के रोने लगा।

हीरो ने अपनी गर्दन हल्की सी झुकाई और अनिल के कान मे कुछ फुसफुसाया। अबकी बार वो बात केवल अनिल ही नहीं बल्कि सबकी समझ मे आ चुकी थी।

- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

रविवार, 13 नवंबर 2016

Breeze

Memories laden wind usually prevails when my feet cross the old bridge.

An aromatic bliss hover throughout the region. Something want to nudge my soul.
Do braided tighten with colourful ribbons. A sweet charming smiles scattering few yellowish flavours to sunflower, the envy of her.

Hands Full of Cherished Balloon getting higher with the lovedrogen gas filled up.
Something unnatural occurs when i cross the old bridge.

- Misra Raahul

दोष

पकड़ कर तलवार तू चल कभी ए यार,
जीनीे है तंग गलियां कोई दोष न दे बार।

गर फलसफा होगा यही भंग करना है तुझे,
हाँ मोड़ दे तू अब लकीरें दोष न दे यार।

ज़िन्दगी हैं जब चलेगी चलती ही जाएगी,
खेंच कर दे पतवार कोई दोष न दे यार।

जिल्लतों की पर्ची फाड़ कर दे फेक तू,
सामने बैठा मुक़द्दर है अब दोष न दे यार।

- मिश्रा राहुल (ब्लोगिस्ट एवं लेखक)
(06-अक्टूबर-2016)(डायरी के पन्नो से)

इश्क़ का बुखार

इश्क़
के बुखार
मिलता
कहाँ है इतवार,


कोई
आये लेता जाए
यादों के
थर्मामीटर* की रीडिंग*।

*thermometer
*reading

- राहुल