बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

Happy Teachers Day : A Film by Maestro Productions



टूटी पेंसिल....पुराने शार्पनर....कलर पेंसिल....चार लाइनर कॉपी....!!
नन्हें हाथो में अनगिनत सपने.....उनको पूरा करने के लिए तैयार एक शख्स पूरी तल्लीनता के साथ...!!!
जब पेंसिल पकड़ अक्षर लिखाते...उनके हाथ में वो नन्हें हाथ समा जाते...दिल में एक विश्वास रहता...गलत रास्तों पर कदम ना भटकने देंगे....

रोक लेंगे....
मार कर... पीट कर...दुलार कर...!!!
चाहे जैसे भी बस....उनके आँखों के सपनों को पहचानते...उन्हे ज़िंदगी के अनुभव बांटते....!!

उन्ही अनुभवों के बीज ऊपर आकार लेने लगते... और एक दिन उस पर मीठे फल लगते....पर तब तक वो शक्स शायद उनके फल चखने के लिए पास ना होता...!!!

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हॅप्पी टीचर डे....

- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

हकीकत



दिल की दरिया कूदकर तराना ढूंढिए,
आप भी कभी हंसने का बहाना ढूंढिए।

ज़िंदगी संवर जाएगी पलभर में ही,
यादों की बस्ती से ऐसा घराना ढूंढिए।

ख्वाब में देखा तो हकीकत भी होगा,
दिन के उजाले में कभी फसाना ढूंढिए।

आप ही के सिक्के निकले हर जगह,
नक्शे में डूबकर ऐसा जमाना ढूंढिए।

बातों में रहते जिसके चर्चे आजकल,
आँखों से पूछकर ऐसा सयाना ढूंढिए।
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©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(०४-अक्तूबर-२०१४)

दलील



दिल भी अब कहाँ खामोश बैठता है,
वक़्त की शाखों पर बेहोश बैठता है।

धड़कता रहता है सीने में हर पहर,
पूछ उससे कितना मदहोश बैठता है।

खोते है लफ्ज गहराइयों में किसी के,
रोज़ तभी लेकर शब्दकोश बैठता है।

दलीलें चलती हर रोज़ मुकदमे की,
मुकद्दर लिए रोज़ निर्दोष बैठता है।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(०३-अक्तूबर-२०१४)

इंतज़ार



मूर्तियों में भगवान खोजते है,
गलियों में इंसान खोजते है।

इंतज़ार करते है अकेले घर,
अपनों में मेहमान खोजते है।

पूछते कहाँ खैरियत अब तो,
रास्तों में सलाम खोजते है।

तोड़ते है दिल उम्मीदों का,
सपनों में जहान खोजते है।

टूट के बिखरती ज़िंदगी में,
किस्तों में अरमान खोजते है।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो में)(०२-अक्तूबर-२०१४)

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

अपना


दिन में भी सपना सा लगता है,
कोई आज अपना सा लगता है।

कदम बहकते हुए दिखते है मेरे,
कोई साज अपना सा लगता है।

चेहरे महकते हुए दिखते है मेरे,
कोई राज अपना सा लगता हैं।

नखरे बलखते हुए दिखते है मेरे,
कोई ताज अपना सा लगता है।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (२७-सितंबर-२०१४)

शनिवार, 27 सितंबर 2014

हमदर्द



टूट जाए तो जता दीजिये,
रूठ जाए तो मना लीजिये।

यादों की बातें याद रहती,
भूल जाए तो सुना लीजिये।

वक़्त अजीब है बुरा नहीं,
लूट जाए तो चुरा लीजिये।

वादों की गठरी लादे बैठे,
फूट जाए तो उठा लीजिये।

दर्द में ऐसा हमदर्द खोजा,
छूट जाए तो बुला लीजिये।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(२६-सितंबर-२०१४)(डायरी के पन्नो से)

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

बेवजह




वजह भी बेवजह दिख रही है,
सुबह ऐसी इशारे लिख रही है।

बहकी बयार रुकी-रुकी सी है,
धूप ऐसी चौबारे खिल रही है।

मगन है भौरें अपने गुंजन में,
भूल ऐसी कतारे मिल रही है।

जलन है लोगों के ख्वाबों में,
धूल ऐसी दीवारे सिल रही है।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (११-सितंबर-२०१४)