कोई पुरानी
नज़्म उठा लूँ...
या नई
गज़ल लिख दूँ...!!
फिर
काले गुब्बारे
पे नक्काशी करूँ,
या नए
सैन्यारे खरीद लाऊं...!!
फिर
उम्मीदों की
एक धूप खोजूँ...
या नए
नज़ारे ढूंढ ले आऊँ...!!
फिर
पॉकेट से
कोई जुगनू निकालूँ,
या नए
सितारे खोज ले आऊँ...!!
बता ज़िंदगी
कोई पुरानी
नज़्म उठा लूँ...
या नई
गज़ल लिख दूँ...!!
©खामोशियाँ-२०१५ // मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (८-जनवरी-२०१५)
भोर के तारे,सांझ का आलस,रात का सूरज,पतझड़ के भौरे.... ताकते हैं हमेशा एक अजीब बातें जो लोग कहते हो नहीं सकता... चलते राहों पर मंजिल पाने को पैदल चल रहे कदमो में लिपटे धूल की परत... एक अनजाने की तरह उसे धुलने चल दिए...कितनी कशिश थी उस धूल की हमसे लिपटने की...कैसे समझाए वो...मौसम भी बदनुमा था शायद या थोड़ा बेवफा जैसा...एक जाल में था फंसा हर आदमी जाने क्यूँ पता नहीं क्यूँ समझ नहीं पाता इतना सा हकीकत...एक तिनका हैं वो और कुछ भी नहीं...कुछ करना न करना में उसे हवाओं का साथ जरूरी हैं..
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