भोर के तारे,सांझ का आलस,रात का सूरज,पतझड़ के भौरे.... ताकते हैं हमेशा एक अजीब बातें जो लोग कहते हो नहीं सकता... चलते राहों पर मंजिल पाने को पैदल चल रहे कदमो में लिपटे धूल की परत... एक अनजाने की तरह उसे धुलने चल दिए...कितनी कशिश थी उस धूल की हमसे लिपटने की...कैसे समझाए वो...मौसम भी बदनुमा था शायद या थोड़ा बेवफा जैसा...एक जाल में था फंसा हर आदमी जाने क्यूँ पता नहीं क्यूँ समझ नहीं पाता इतना सा हकीकत...एक तिनका हैं वो और कुछ भी नहीं...कुछ करना न करना में उसे हवाओं का साथ जरूरी हैं..
शनिवार, 17 अगस्त 2013
शुक्रवार, 9 अगस्त 2013
धूप के जंगल
बांध के सब्र मे तुम...
ढूंढ लो गहराई भी....!!!
जिसमे उतार कर मैंने...
सुखाई हैं तनहाई भी...!!!
इन धूप के जंगलो से
बचाकर तराशा उसे...!!!
वरना कहाँ सरकती हैं...
आग मे पुरवाई भी...!!!
साथ उनके आने से
उठ पड़ी कब्रे...!!!
वरना कितने मुद्दतों से
पकड़ा था परछाई भी....!!!
©खामोशियाँ-२०१३
रविवार, 4 अगस्त 2013
बूढ़ा धुआँ
कुल्लियाँ करती उफनाती बटुली...!!
उसपे फूँक मारने तरसती बयार...
एक बूढ़ा उठता धुआँ...
चिमनी पर चढ़ के...
चाँद मे समा गया....!!
दौड़के उसके पीछे कैसे...
काला साया लिए निशा...
भीग गयी पसीने से...!!
©खामोशियाँ-२०१३
शुक्रवार, 2 अगस्त 2013
लम्हे की दास्ताँ
गिरा पड़ा ....
वक़्त की कारवां से कट कर लम्हा....!!
सुना हैं ......
उम्मीद की धूप थोड़ी देर रहेगी...!!
हिम्मत हैं तो .....
चल परछाइयों के निशान पकड़े...!!
मिल जाएगा लश्कर....
दर्द से बोझिल हुई साँझ से पहले....!!
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