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अपनी खामोशियाँ खोजे

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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

लप्रेक ४



स्टूडेंट गैलरी पर एक स्टैंड पर खड़े अपनी-अपनी किताबें खंगाल रहे थे। तभी वो बोल पड़ा "जब से इश्क के रोजगार हुए है, नज्में भी सन्डे खोजती।" बोलकर चुप हो गया।

"नज्मों की दुकान नहीं खुलती, मेरा शहर सन्डे को बंद रहता।" मिल गया जवाब एक प्यारी सी हंसी देकर फुल स्टॉप लगा दिया।

रस्किन बांड और पॉल कोएल्हो पढने वाली बाला कबसे हिंदी में जुमले पढने लगी।

तुमसे बदला लेने के लिए इतना तो ख्याल रखना होगा ना मेरे मजनू। वैसे भी मिले थे बुक स्टोर पे और तुमने ही सिखाया था एक बुक को दो लोगो को पढने में प्यार बढ़ता।

तभी मेरी बुकमार्क पर तुम आगे बढ़ जाती और तुम्हारी पे मैं। दोनों ख़त्म करते तो आधी तुम पढ़ पाती आधी मैं। कुछ ऐसा करो दोनों साथ ख़त्म कर सके पूरी किताब।

©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से)(२०-अगस्त-२०१५)

सोमवार, 17 अगस्त 2015

लप्रेक ३


घुप अंधेरे में धर्मशाला फ्लाईओवर पार करते। उसने बस ये कहा कि रात को शहर इतना खामोश क्यूँ हो जाता है मानो चाँद इयरफोन लगाकर बातें सुनता।
जैसे दिन में शहर तेरी बक-बक से इतना शोर हो जाता की मेरी फरमाइश तुम्हारी माइक तक नहीं पहुँचती मिस आरजे। व्हाट्सएप फरमाइश नहीं चलती क्या तुम्हारे एफ़एम मे।

कभी बाजा भी दो। "प्यार तो होता है प्यार। फिल्म-परवाना"

दिनभर एक तरफा वाकी-टाकी लगाए तुम बोलते रहती। सुनो ऐसा क्यूँ न करे मैं भी दूसरे एफ़एम आरजे बन जाऊँ और फिर बातें होती रहेंगी पूरे शहर के बीचों-बीच।

दूर जाती मोटरसाइकल में दोनों की आवाज मद्धिम होते चली गयी।

©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (१६-अगस्त-२०१५)

लप्रेक २


पंद्रह अगस्त समारोह के दो स्कूल हाउस कैप्टन दूर से निगहबानी कर रहे। तम्बू पर कान चिपके सारे फुसुर-फुसुर सुन रहे।

दो मिनट तक तो आजाद रहो तुम। कल पंद्रह अगस्त हैं ना??
तो आज क्या गुलाम हो तुम??? ये तुमसे बेहतर और कौन जानेगा।

हद करते हो। तुम्हें फ़ीता तक तो बांधने का टाइम नहीं, लाओ ना मैं बांध देती हूँ। दूर खड़ी पूरी स्कूल की आँखें दो घरों में एक घर बना रहे। वो तो केवल बालों की क्लिप में लगे तिरंगे को ही जाने कबका सल्युट मारकर परेड पूरा कर दिया।

©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल
(डायरी के पन्नो से) (१५-अगस्त-२०१५)

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

लप्रेक १


सीटी के साथ ट्रेन निकल पड़ी। खिड़कियों से सटे दो आँखों के बीच दो उँगलियाँ एक दूजे में गुफ्तगू कर रही। पीले बैक्ग्राउण्ड में काले अक्षरों के बोल्ड लेटर में कुछ गुदा है। आपातकालीन खिड़की से पूरा गर्दन बाहर निकालकर देख तो लिया। भुनभुनाया भी "engage" पर स्टेशन जैसा नहीं लग रहा ये नाम।
उसके दुपट्टे ने अभी आधा सर कलम किया था कि "टिकिट दिखाइए"।

उसने टीटी को घूर कर देखा। लो दिखा दो ना। इतना कहकर मुस्कुरा दी और आधे सर कलम की रश्म भी पूरी हो गयी। 

स्क्रीन पर टिकिट था ही नहीं, बस वही पीले बैक्ग्राउण्ड में काले बोल्ड अक्षरों में कुछ गुदा था जो वह आजतक भूल नहीं पाया। स्टेशन का नाम नहीं था। भला अंकगणित में स्टेशन कब से छपने लगे।

©खामोशियाँ | (१३-अगस्त-२०१५)
(मिश्रा राहुल) (डायरी के पन्नो से)

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

साकी



चाहे पागल कह दें पर जाम दे दे,
साकी इतना ना रुला इनाम दे दे..!!

सपने बेगैरत हुए है आज कल के,
जिंदगी फिजूल रही मुकाम दे दे..!!

नींद नहीं दे सकता मर्जी है तेरी,
बस कश्ती को मेरी अंजाम दे दे...!!

वास्ता क्या है मेरा-तेरा पता नहीं,
मुझे ज़िन्दगी की पहचान दे दे..!!


©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल 
(०६-०८-२०१५)(डायरी के पन्नो से)

बुधवार, 5 अगस्त 2015

थोडा सम्हलकर चल


दिल अभी टूटा है 
थोडा सम्हलकर चल,
देख लिया बहुत कदम बदलकर चल..!!

साँझ है अभी शब भी आएगी जल्द ही,
किस्मत से कभी आगे निकलकर चल..!!

थोडा सा ही बचा है फासला तेरा-मेरा,
कभी गलियों का माज़रा देखकर चल..!!

पता चल जाएगा तुझे दर्द-ए-इश्क मेरा,
ज़रा अपने जूते मुझसे बदलकर चल...!!


©खामोशियाँ-२०१५ | मिश्रा राहुल 
(०५-०८-२०१५)(डायरी के पन्नो से)