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बड़ी खामोसी से बैठे हैं फूलो के धरौदे....जरा पूछ बतलाएंगे सारी गुस्ताखिया....!!!______ प्यासे गले में उतर आती....देख कैसे यादों की हिचकियाँ....!!!______ पलके उचका के हम भी सोते हैं ए राहुल....पर ख्वाब हैं की उन पर अटकते ही नहीं....!!!______ आईने में आइना तलाशने चला था मैं देख....कैसे पहुचता मंजिल तो दूसरी कायनात में मिलती....!!! धुप में धुएं की धुधली महक को महसूस करते हुए....जाने कितने काएनात में छान के लौट चूका हूँ मैं....!!!______बर्बादी का जखीरा पाले बैठी हैं मेरी जिंदगी....अब और कितना बर्बाद कर पाएगा तू बता मौला....!!!______ सितारे गर्दिशों में पनपे तो कुछ न होता दोस्त....कभी ये बात जाके अमावास के चाँद से पूछ लो....!!!______"

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शनिवार, 31 मई 2014

गलियों


गलियों को ध्यान से देखो तो,
कभी भूले से खुद को रोको तो....!!!

हम दौड़-दौड़कर जहां से
पार्ले-जी लेकर आते थे,
जब सचिन-दादा बनकर,
आसमानी छकके लगाते थे...!!!
पाँच रूपये का मैच खेलकर,
सबके मन को भाते थे....!!!

गलियों को ध्यान से देखो तो,
कभी भूले से खुद को रोको तो....!!!

चूरन-पुड़िया-कोला-गुड़िया,
आजभी लाती पागल बुढ़िया,
पर समय नहीं खेले-पुचकारे,
हँसकर उसको अम्मा पुकारे....!!

गिनती हाथो मे भाती थी,
हंसी तीन पैसो की आती थी,
तीन पैसे भी खर्च ना होते...
अम्मा की चिमटी आती थी....!!

गलियों को ध्यान से देखो तो,
कभी भूले से खुद को रोको तो....!!!

हमने भी हीरो होते थे,
चाचा-डोगा सब होते थे...
साबू सबको प्यारा था,
ध्रुव सबका राज-दुलारा था....!!!

जब एक ही टीवी होती थी,
उसमे भी सीता रोती थी,
पूरे गाँव मे आँसू छाता था...
रावण दिल दुखलाता था...!!

गलियों को ध्यान से देखो तो,
कभी भूले से खुद को रोको तो....!!!

©खामोशियाँ-२०१४ 

गरीबी


छोटा लेई बनाता है,
बड़ा जिल्द चढ़ाता है।
किताबें खूब आती घर,
पढ़ने किसे आता है।

मझला होटल जाता है,
जूठे बर्तन खंगालता है।
व्यंजन बड़े अगल-बगल,
पेट कुछ कहाँ समाता है।

घर को लौट सब आते,
लकीरें वहीं छोड़ आता है।
किस्मत इतना दिखाता,
शाम साथ तो बिताता है ।

चित्र-साभार गूगल
©खामोशियाँ-२०१४

गुरुवार, 22 मई 2014

उलझी बातें


देखकर कैसे अब नजरें फेरता है,
इंसान भी यहाँ शैतानों से खेलता है।

सोच से परे होते हैं कुछ चेहरे देख,
सोने का भाव पैमानों से तौलता है।

कितनी उलझी है बातें आजकल की,
सीधे सा जवाब सवालों में बोलता है।

दोस्ती-दुश्मनी मे भी फासला कैसा,
जहर की मिस्री ख्यालों में घोलता है।

©खामोशियाँ-२०१४//मिश्रा राहुल

शुक्रवार, 16 मई 2014

ज़िंदगी


सुलझी ही रहती तो जिंदगी कैसे होती...
उलझी ही रहती तो बंदगी कैसे होती....!!!

नाम हथेली मे छुपाए घूमते रहती...
बहकी ही रहती तो सादगी कैसे होती....!!!

चर्चे फैलते जा रहे हर-तरफ मुहल्लों मे...
हलकी ही रहती तो पेशगी कैसे होती....!!!

पसंद तो करते ही हैं तुझे सारे चेहरे....
चुटकी ही रहती तो बानगी कैसे होती...!!!

©खामोशियाँ-२०१४ मिश्रा राहुल

गुरुवार, 8 मई 2014

माँ


आज सोमवार था। सुबह के आठ बजे थे। रोनित अभी तक बिस्तर पर लेटा हुआ था। हाँ अलार्म जाने कितनी बार उसके कानो को छु के निकल गया पर रोनित उठने का नाम नहीं ले रहा था। सामने शिव मंदिर पर भजन-कीर्तन की जोरदार आवाज़ ने रोनित को जगा ही दिया।

रोनित एक छोटा सा बच्चा महज़ 12 साल का। हाँ छोटा ही उसकी माँ के लिए अब भी वो। रोनित को सुबह-सुबह मे स्कूल जाना होता था पर वो अक्सर देर से उठने की वजह से हमेशा भागता ही जाता था।
हर दिन की रूटीन की तरह आज भी मिसेज अग्रवाल सुबह उठी। पूरे घर की सफाई की, सारे मैले कपड़े धो डाले , धुले कपड़े आलमारी मे तह कर दिये, बेटे के लिए नाश्ता बनाया। ओफो इतनी सारी ऊर्जा आखिर कैसे मिलती उनको। सारे काम करने पर भी मिसेज अग्रवाल थकती नहीं। हाँ मिसेज अग्रवाल ही तो बुलाते लोग उन्हे, या फिर अग्रवाल आंटी, रोनित की मम्मी। यही सब उनके नाम है शायद। वो तो शायद अपना स्वाति नाम तक भूल गयी हैं।

आज भी रोज़ की तरह उनका खाना किसी ने नहीं खाया। बेटे को स्कूल की जल्दी थी और पति को ऑफिस की। पर कोई बुरा मान जाए तो उनका ख्याल रखा जाता मनाया जाता, पर माँ को बुरा मानने का सवाल ही नहीं पैदा होता। वो तो बिना पगार, बिना की स्वार्थ अपना काम करती। उसे ना तो बोनस की चिंता होती, ना ही एरिअर की। ना इतवार को उनकी छुट्टी होती ना किसी त्योहार को उनका आराम, बल्कि इन दिनो तो उनसे लोग एक्स्ट्रा काम करवा लेते। पर माँ किस मिट्टी की बनी होती कभी बुरा ही नहीं मानती।

शाम को भी थके हारे शांतनु अग्रवाल और रोनित आए। फिर खाना खाया और सो गए। शायद इस व्यस्त सी दिन-चर्या मे हर वो चीज थी पर बस स्वाति अग्रवाल छोड़कर। स्वाति को मायके गए भी काफी दिन हो गए थे। शायद एक बार ही गयी थी वो सात साल की शादी के बाद। पर स्वाति कभी इस बारे मे सोचती ना थी। अब तो रोनित और शांतनु अग्रवाल को उसकी लत लग गयी थी। यह अलग बात थी कि उन्हे पता नहीं था इस बाते मे बिलकुल भी।

स्वाति ने सोचा एक बार मैं इन्हे अपनी एहमियत दिखा दूँ। आज जब मिस्टर अग्रवाल ऑफिस से घर आए तो स्वाति ने अपने घर के याद आने का बहाना बना लिया। शांतनु तुरंत तैयार हो गए उसकी बात पर अभी भी शांतनु को एहसास नहीं था कि स्वाती चाह क्या रही। खैर रात बीती और सुबह सुबह 6 बजे की एक्सप्रेस से स्वाति अपने गाँव लौट रही थी। स्वाती का गाँव काफी दूर पर बसा हुआ था। पूरे 36 घंटे लग जाते थे उसे वहाँ जाने मे। स्वाति को मन मे तरह तरह के ख्याल आ रहे थे कि शायद उसने जल्दबाज़ी मे गलत कदम उठाया है। आखिर माँ जो थी पर फिर भी उसने अपने दिल पर पत्थर रख कर यात्रा जारी रखी।

स्वाती के जाते ही। रोनित और शांतनु की दिन-चर्या बुरी तरह प्रभावित हुई। दोनों देर से उठे आज नाश्ता नहीं था सुबह कि मसालेदार चाय टेबल से गायब थी। इस्त्री किए कपड़े नहीं थे। घर के तौलिये से लेकर, दूध लेने तक की ज़िम्मेदारी आ दो नाजुक कंधो पर थी। घर की हर चीज ऐसे मूक हो गयी थी कि मानो सब के सब स्वाति को पुकार रहे हो। रोनित को अब माँ सताने लगी वो हर बात पर माँ के किए काम को याद करता था। रोनित ही नहीं शांतनु को भी अब स्वाति की याद आने लगी थी। अभी स्वाति अपने घर पहुंची भी नहीं थी कि शांतनु ने उसे फोन कर दिया।

शांतनु बोले, "स्वाति कैसी हो"
स्वाति को विश्वास ही नहीं हुआ कि शांतनु ने अपने व्यस्त दिनचर्या मे से उसके हाल चाल के लिए समय निकाल लिया है।
स्वाती हड़बड़ाते हुए बोल पड़ी, "अच्छी तो हूँ, एक दिन मे क्या बिगड़ जाएगा"
शांतनु फिर शालीन लहजे मे कहे, "नहीं ऐसे ही आज तुमसे बात करने का दिल कर रहा था। कुछ अच्छा नहीं लग रहा ऑफिस मे हूँ बैठा। रोनित भी काफी परेशान हो रहा है तुम्हारे बिना। तुम कुछ दिन रहकर जल्दी चली आना ये घर तुम्हारे बिना सूना सा लगता है।"
स्वाति अपनी दांव मे सफल होती दिख रही थी। उसने बोला, "अच्छा अभी पहले पहुँचने तो दो आ जाऊंगी, फिर भी एक हफ्ते तो लगेंगे ही"
शांतनु भी थोड़े मायूस होते बोले, "एक हफ्ते अच्छा ठीक है। ख्याल रखना अपना।"

स्वाती ने शांतनु से बात करते ही अगले स्टेशन पर गाड़ी छोड़ दी और अगली गाड़ी कि प्रतीक्षा करने मे जुट गयी। आज स्वाती बड़ी खुश थी। इसलिए नहीं कि उसने सबको हरा दिया बल्कि वो तो खुश थी कि आज उसे अचानक देखकर रोनित और शांतनु कितने प्रसन्न होंगे। अभी स्वाति इसी उधेड़बुन मे थी कि उसकी गाड़ी उसे पुकारने लगी अपनी सीटी देकर, कि वो उसमे बैठकर चल दे घर कि तरफ। तरह-तरह के ख्वाब लिए, आज सर्प्राइज़ दूँगी सबको। रोनित से मिलूँगी, शांतनु भी होगा केवल 7 घंटो मे कितना कुछ बदला-बदला नज़र आ रहा था।
शांतनु और रोनित शाम को घर लौटे फिर समान अस्त-व्यस्त देखकर बड़े दुखित हुए। हर पल हर जगह बस बातों मे स्वाति अग्रवाल ही होती थी। दोनों इतने थके थे कि बाहर जाना दूर वो आते ही बिस्तर पकड़ लिए, पर भूख और नींद की जबर्दस्त टक्कर होती रही। काफी देर बाद आखिर कार जीत भूख की हुई।
अब रोनित शांतनु को ऐसे देख रहा थे, मानो पूछ रहे हो कि आखिर हमने क्यूँ इतना खराब बर्ताव किया की मम्मी चली गयी। दोनों की खामोश बातें जारी थी कि घर की बेल बजी।

डींग-डोंग.... डींग-डोंग.... डींग-डोंग....
शांतनु सोचते जा रहे थे आखिर इतनी रात को कौन होगा। घर मे स्वाति भी नहीं मैं खुद भूखा सो रहा कोई मेहमान हुआ तो बाहर से कुछ लाना पड़ेगा। ये लोग भी ना बिना टाइम आ जाते। जाने क्या क्या सोचते शांतनु ने दरवाजा खोला।
सामने थी,"वही 5'8" की काया वाली गोरी सी औरत रात जिसका राग दोनों बाप-बेटा मिलकर आलाप रहे थे। शांतनु ने उसे देखते ही गले से लगा लिया। मानो दोनों कितने जनम से मिले ना हो। रोनित भी सामने आ गया और एक सांस मे उसने सब कुछ मम्मा को ऐसे बता दिया जैसा वो कभी बचपन कभी स्कूल से आकर बताया करता था।

पाँच मिनट तक तीनों एक दूसरे से लिपट रोते रहे। भूख के सूखे खेत को तीनों ने अपनी आँसुओ से सींच दिया।

दुनिया मे कोई कितना भी बदल जाए माँ नहीं बदलती। माँ एक कम्यूनिटी है। वो अनूठी है वो बदल सकती ही नहीं। वो सच्ची होती है। आखिर तभी तो भगवान ने उसे अपना दर्जा दे रखा है।

आखिर मे मुन्नावर राना का एक शेर लिखना चाहूँगा बिना उसके ये कहानी पूरी नहीं होगी।
ख़ुदा ने यह सिफ़त दुनिया की हर औरत को बख़्‍शी है, कि वो पागल भी हो जाए तो बेटे याद रहते हैं।

Advance Happy Mothers Day 11 May '14

मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)

शुक्रवार, 2 मई 2014

परिस्थिति


बादल गरज रहे, काले काले बादलो से पूरा आसमान पटा पड़ा है। मोर अपनी पंखों को फैलाकर नाचने के तैयारी मे खड़े। सूरज अपनी दुम दबाये उसे पीछे-पीछे चल रहा। कभी बाहर आता तो कभी छुप जाता। अभी लोग घरों से निकल खुशियाँ मना रहे थे कि बारिश शुरू हो गयी। सबके चेहरे पर खुशी का पुरजोर आलम, आखिर हो क्यूँ ना पिछले काफी दिनो से जो यहाँ बरसात की एक बूंद तक नसीब ना हुई थी। एक मनोहारी वातावरण तैयार हो चुका था। इतने मे ट्रेन के इंजिन की एक ज़ोर सी आवाज़ ने सत्यपाल की आँखें खोल दी।
सुबह हो चुकी थी और सामने था चटक धूप वाला तपता सूरज। सत्यपाल चिल्ला उठा "सपना था हाँ सपना था"।

सत्यपाल सिंह, लखीमपुर खीरी से करीब 45 किमी उत्तर की तरफ बसा बसतौली गाँव का एक निहायत ही गरीब गन्ना किसान। घर मे रुपए जुटाने की जुगत मे कभी सरकारी चीनी मिलों मे मजदूर की हैसियत से भी काम करते थे। नीचे जमीन खाती फसल पर सूरज काका की बेरहमी उसके जुबान पर हर समय ताज़ी रहती थी। घर मे सत्यपाल के अलावा उसकी पत्नी मंजू और उसकी एक बेटी गुड़िया थी। कभी किसी जमाने मे सत्यपाल खुद को अपने क्षेत्र के नामी किसानो मे गिनती हुए पाते थे, पर आज तो स्थिति बिलकुल पलट है। घर मे बस एक पहर ही चूल्हा जलता था, वो भी आधा अधूरा। चार लोगों की थाल हमेशा एक ही मे सजाई जाती थी। जिसमे कभी सूखा चावल होता या फिर सिर्फ रोटी। खाने के समय लोग एक दूसरे को दिलासा दे कर ही पेट भरते रहते थे।

बलरामपुर चीनी मिल की गुलारिया इकाई मे कार्यरत सत्यपाल बस किसी तरह गुजर बसर कर रहे थे। सब कुछ बीत ही रहा था किसी तरह। सत्यपाल दिन बदिन उम्र लांघते जा रहे थे। घर मे बेटी के शादी की चिंता उनका सर खाए जा रही थी। हर पहर अक्सर यही बात चलती रहती "गुड़िया की शादी हो जाए बस अपनी तो पेट काट लेंगे किसी तरह"।

मंजू सिंह स्वभाव की काफी गंभीर महिला थी। घर मे कुछ भी कमी हो पर वो शिकायत ना करती थी, बस काम चला लेती थी। एक दिन सुबह सुबह अचानक से बैठे बैठे मंजू  मौके की नज़ाकत भाँपते हुए थोड़े शरारती मुद्रा मे बोले पड़ी, "अरे एहरों सुनबो!! बिटिया का बियाह कराइबो की घर बैठहें रहिबों "
सत्यपाल अपनी लहजे मे बोल पड़े, "बियाह होई!! तनिक और इंतज़ार करी लौ, बात किहेन है दिनेशवा से"
इतना बोल कर सत्यपाल अपने रोज़मर्रा की काम मे तल्लीन हो गए।

शाम को दिनेश भी आ गया। अक्सर दिनेश ही रिश्तों को पक्का-कच्चा कराता था। सब लोग बैठ गए और इतमीनान से बात करने लगे।
"ए दिनेश, कौनों नीक लाइका होय त बतावों, आपन अवकात त तू जनते हौ, दु जून के रोटी कौनों तरहियन से सेकावेले" भाभी और सत्यपाल ने एक सुर मे अपनी राय बोल दी
दिनेश ने काफी गहरी सांस ली और कुछ चार पाँच फोटो झोले के कोनो से खींच कर बाहर कर दिये।
देखते ही देखते मंजू ने एक पकड़ इशारे से ही सत्यपाल की भी राय भाँप ली।
दिनेश भी समझ गया था। गुड़िया को अब सत्यपाल बाबू अपने यहाँ और जगह नहीं देना चाह रहे थे। खैर दिनेश ने सर हिलाया और हाथ जोड़ आज्ञा मांगते हुए बोला, "ठीक है बाबूजी हम आपकी बात इन तक पहुंचा देंगे और लेनदेन आप कर लेना, हम इस पचड़े से दूर रहते है। "
दिनेश के जाने के बाद मंजू और सत्यपाल मे अच्छी ख़ासी बात चली थी कुछ दलील देती बातें, कुछ समझ भरी बातें।

कुछ रोज़ बीते। अजीत सिंह सत्यपाल के यहाँ खुद ही पधार दिये। बातें काफी हो गयी तभी, मिसेज सिंह ने कहा अरे सत्यपाल जी मेरी बिटिया से तो मिलवा दीजिये। मंजू ने तुरंत आवाज़ लगाई, "गुड़िया आजा बेटा" ।
बिलकुल मंजू की छायाचित्र की एक नन्ही गोरी सी सचमुच की चलती फिरती गुड़िया सामने आके खड़ी हो गयी। गुड़िया को तो देखते ही कोई भी रिश्ता पक्का कर ले। सर्वगुणसंपन्न जो थी।
तो आखिर कार उन्होने भी हाँ भर दी।
सत्यपाल ने झिझकते हुए पूछा,"ठाकुर साहब आप अपनी मांग भी बता दीजिएगा हम नहीं चाहते बाद मे कोई समस्या मन-मुटाव आए"
अजीत सिंह ने शालीन पलटवार किया, "सत्यपाल जी क्या बोल रहे आप, पाप करवाएँगे हम लोगों से। अभी तक जितनी पुण्य किया है सब बर्बाद हो जाएगा"।
लड़के वाले शायद दहेज की खिलाफ थे। वो तो लड़की चाहते थे सुंदर, सुशील, बुद्धिमान। मंजू-सत्यपाल की खुशी देखते बन रही थी। आखिर एक बहुत बड़ा काम जो उन्होने कर डाला था। पंडित बुलाया गया शुभ मुहूर्त मिल गया 7 जुलाई। बात पक्की हो गयी गुड़िया-विवेक की जोड़ी अच्छी जमेगी यही दिनेश ने बोलकर मुंह मीठा करवा दिया।

तैयारियां ज़ोरों पर चलने लगी। दहेज ना लेने पर भी लड़की के ज़रूरत के समान खरीदने भी तो थे। चार महीने बस बचे थे। सारी गणित अच्छी ख़ासी बना ली थी सत्यपाल ने। कुछ पैसा जमा थे उन्हे निकालने की अर्जी भी दे आई थी। सत्यपाल अब तो दुगनी मेहनत से खेत से लेकर मिल तक सब काम कर आते थे। मिल मे भी उन्हे  काफी दिन से पैसे मिले नहीं थे, अब वे मांगते भी नहीं थे। सोच रहे थे अभी मिलेंगे तो खर्च हो जाएंगे कुछ दिन बाद ही मिले तो ही बेहतर।

हर तरफ खुशी का माहौल जमघट लगाए पाँव पसार चुका था। जिस घर मे कभी रौनक नहीं दिखती थी उसमे आज एक अजीब ही हलचल आ गयी थी। मुखरे खिल गए थे हर-किसी के। मंजू घूम फिर के बस गुड़िया की ही बात कर देती, उसे समझाते रहती। गुड़िया ससुराल मे ऐसे करना वैसे करना। सास की सेवा करना बड़ो की इज्ज़त करना, कोई कुछ भी बोले जवाब ना देना। आखिर एक ही तो बिटिया थी फूल जैसी उसे कैसे यून्ही छोड़ देती।

दिन इतनी तेज़ी से बीत रहा था। शादी की तारीख नजदीक बस बीस दिन बचे थे। सत्यपाल आज थोड़े परेशान से दिख रहे थे। रोज़ की तरह उन्होने आज गुड़िया को भी नहीं पूछा। सीधा कोने वाले कमरे मे चले गए। मंजू अपने काम मे इतनी व्यस्त थी की वो उन्हे देख ही नहीं पाई। पर सिसकने की आवाज़ सुन वो फौरन उस अंधेरे कमरे मे दाखिल हुई। वो कमरा अजीब सा काल रूपी नज़र आ रहा था आज, जो भी जा रहा था उस तरफ वो उसे लीलने की नीयत से आगे आ जा रहा था।
मंजू से सत्यपाल की ओर देखते पूछा,"क्या हुई गवा काहें एतना रोवत हौ"
सत्यपाल रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। मंजू ने बड़ी मशक्कत के बाद वो कुछ समझ पाई।
अब मंजू भी उसी तरह रोने लगी। दोनों एक दूसरे को देख रोए ही जा रहे थे। मानो कोई पहाड़ सा टूट पड़ा हो।
सत्यपाल यही बोले जा रहा था, "गन्ना बर्बाद हो गया, हम बर्बाद हो गयी। हे ईश्वर ऐसे हमारे साथ ही क्यूँ करता। सूरज बाबा कभी कम भी जला करो काहें हमरी किस्मत मे आग लगा जाते। ऊपर से बैंक वाले भी"
यही सब बोलता सत्यपाल मिल की तरफ भागा।
पर मंजू रोती रही उसके सपनों के पर्दों पर मानो कोई कैंची मार दिया हो। जगह जगह से फट चुके पर्दो पर अब पुराने जैसी तस्वीर नहीं बन रही थी। मन मार कर मंजू बैठ गयी।
मंजू एक शब्द बोलते जा रही थी, "हमरी किस्मत मे ही ई काहें गोंज दिहे भगवान"। ये सब बोलते बोलते मंजू सो गयी।

उठी तो काफी लेट हो चुकी थी। पर सत्यपाल नज़र नहीं आ रहे थे। शाम तक अक्सर वो आ जाया करते थे। पर रात हो आई थी। अब मंजू जाए भी तो कैसे घर मे गुड़िया अकेली थी। तभी बाहर मची कोलाहल देख वो दंग रह गयी। या ये कहें की उसे विश्वास ही नहीं हुआ ऐसा। बहुत दूर किसी को घेर पूरे मुहल्ले वाले खड़े थे। शोर-शराबा चीख सब उसके विपरीत ही थे पर उसका मन अभी ये मानने को तैयार नहीं था। बस 100 कदम का ये सफर मानो 100 दिन ले रहा था, उसके कदम थक रहे थे। उसके आँखें और देखने की गवाही नहीं दे रही थी, कान सब सुन के अनसुना करना चाहते थे। पर परिस्थिति इस बार फिर मंजू की शक्ति जाँचने को तैयार खड़ी थी।

हाँ, सत्यपाल लेटे पड़े थे। वे मिल के बॉयलर मे उबलते पानी मे गिर के अपनी जान खो चुके थे। मिल के आला अधिकारियों से लेके मजदूर तक सब मंजू को दिलासा दे रहे थे। आखिर सत्यपाल ऐसे व्यक्तित्व के आदमी थे कि उनसे कोई नाराज़ हो ही नहीं सकता था, सिवाय ईश्वर से। भगवान से उनकी कभी बनी नहीं। काफी मंजर बदल गए थे। दुखों के बादल तो बस मंजू के आँगन मे अपना डेरा डाले कष्टों की बारिश किए जा रहे थे।
मंजू बेसुध हो चुकी थी। गुड़िया रोए जा रही थी। सबने मंजू-गुड़िया को सम्हाला। सत्यपाल का दाह-संस्कार किया।

बीस दिन बाद। गुड़िया की शादी हुई। हाँ बड़ी धूम-धाम से। सभी मजदूरों ने अपनी एक महीने का वेतन काट सत्यपाल की झोली मे दे दिया था। मिल मालिक ने भी काफी मदद की। शायद किसी बात की कोई कमी नहीं थी उसकी शादी मे। बस सत्यपाल नहीं थे।

शादी मे बैठी गुड़िया ये तय नहीं कर पा रही थी किसको धन्यवाद करें। अपने बाबूजी को जो उसकी लिए अमूल्य धरोहर थे, अपनी माताजी को जिसने कभी सुख का स्वाद ही नहीं चखा, या वहाँ खड़े उसके बाबूजी के साथियों को जिनके पास बहुत सारा पैसा तो नहीं पर हाँ दिल था बहुत बड़ा। शायद ईश्वर भी उसमे समा जाये हाँ। आपने सही सुना "ईश्वर भी उसमे समा जाए"

- मिश्रा राहुल
(ब्लोगिस्ट एवं लेखक)